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मानव सभ्यता के प्रथम निर्माता शिल्पकार और प्रजापति समाज के गौरवशाली इतिहास को रेखांकित करते हुए संविधान प्रदत्त शिल्पकार आरक्षण लागू करने की पुरजोर माँग उठाई गई है। अतिपिछड़ा एकीकरण महाअभियान के संस्थापक अनिल कुमार प्रजापति ने कहा कि सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर मौर्य-गुप्त काल, खजुराहो, कोणार्क और लालकिले के निर्माण तक शिल्पकारों का खून-पसीना बहा है। यहाँ तक कि आज की दुनिया जिस पहिये पर दौड़ रही है, उसका आविष्कार भी शिल्पकार के चाक की नकल से ही हुआ है।
इसके बावजूद वर्तमान समय में इस मेहनतकश समाज को उपेक्षा का शिकार होना पड़ रहा है। भारतीय संविधान द्वारा स्थाई रूप से दिए गए शिल्पकार आरक्षण से समाज को वंचित रखा जा रहा है, जबकि ईडब्ल्यूएस (EWS) आरक्षण को रातों-रात बिना किसी विरोध के पास कर दिया गया। सरकार के इस दोहरे मापदंड पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया गया है कि एक साज़िश के तहत अतिपिछड़ी जातियों को शिक्षा और सुरक्षात्मक कवच से दूर रखा जा रहा है ताकि धनबली और प्रभावशालियों की तानाशाही हुकुमत बदस्तूर चलती रहे।
स्वतंत्रता संग्राम के सबसे कम उम्र के शहीद रामचंद्र विद्यार्थी के योगदान को याद करते हुए स्पष्ट किया गया कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक बसे दस्तकार समाज और कुम्हारों को अब उपेक्षा नहीं बल्कि सम्मान चाहिए। शिल्पकारों को अब भीख नहीं बल्कि अपना संवैधानिक हक चाहिए, जिसके लिए ‘शिल्पकार आरक्षण लागू करो’ के नारे के साथ अपने अधिकार और स्वाभिमान की लड़ाई को आगे बढ़ाने का आह्वान किया गया है।
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