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शिल्पकार आरक्षण के इस बेहद पेचीदा मसले पर केवल मुट्ठी भर सहयोगियों के साथ विषम परिस्थितियों में लड़ाई लड़ी जा रही है, लेकिन लोग बिना संघर्ष को समझे अनुसूचित वर्गों के समान तत्काल सुविधा की मांग कर रहे हैं। इस संघर्ष में मानव सभ्यता के मुख्य शिल्पी कुम्हारों के सहारे सभी वंचित अतिपिछड़ी जातियों का बेड़ा पार होना लगभग तय है। शिल्पकार समूह के अंतर्गत कुल 38 उपजातियां आती हैं और यह बात केवल 17 अतिपिछड़ी जातियों की नहीं है। यदि इस लड़ाई से कुम्हार/प्रजापति समाज लाभान्वित होता है, तो तुरंत बाकी 37 उपजातियों का संवैधानिक अधिकार सर चढ़कर चिल्लाने लगेगा और दुनिया का कोई कानून उसे रोक नहीं पाएगा।
सदियों से उपेक्षा का शिकार होकर बदहाली झेल रहे इन वंचित, अतिपिछड़े, उपेक्षित और भूमिहीन मजदूर वर्गों के कायाकल्प के लिए आज एक बड़े जनांदोलन और एकजुट संघर्ष की जरूरत है। जो लोग निजी राजनीतिक स्वार्थ और जातिगत गुटबाजी के चलते इस विशाल निर्णायक आबादी को गुटों में बांट रहे हैं, उनके लिए ‘अतिपिछड़ा एकीकरण महाअभियान’ का फार्मूला अपनाना ही एकमात्र रास्ता है। इस फॉर्मूले को अपनाकर ही संख्यात्मक हिस्सेदारी के बल पर प्रदेश और देश की सियासत को घुटने टेकने और चरण वंदना करने पर मजबूर किया जा सकता है। मानसिक गुलामी की जी-हुजूरी का परिणाम सबके सामने है, इसलिए समझदारों को अब एकजुट हो जाना चाहिए।
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