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दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए पहुंचे युवा किसी सक्षम या सामर्थ्यवान परिवार के नहीं, बल्कि बदहाल शिक्षा व्यवस्था, लचर कानून और भ्रष्ट कार्यप्रणाली से परेशान गरीब, कमजोर और मध्यम वर्गीय छात्र थे। इस दौरान बांदा के छात्र लवकुश प्रजापति के पैर में फ्रैक्चर हुआ और उन्हें गंभीर चोटें आईं। छात्रों पर हुए लाठीचार्ज की कड़े शब्दों में निंदा की जा रही है। आरोप है कि पक्ष और विपक्ष दोनों ही पाखंडवाद और दक्ष प्रजापति जयंती जैसे आयोजनों के सहारे अतिपिछड़े व उपेक्षित वर्गों को बहकाकर केवल वोट की राजनीति कर रहे हैं।
यदि सरकारें भेदभाव मुक्त, सस्ती व समान शिक्षा देने के साथ-साथ संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक न्याय के लिए गंभीरता से काम करतीं, तो आज लाठीचार्ज की नौबत नहीं आती। देश में असली लड़ाई अमीरी और गरीबी के बीच है, जबकि वर्तमान सरकार धन्नासेठों को बचाने में जुटी हुई है। अगर आरक्षण प्रणाली को समरूप बनाकर निचले तबके को विकास की मुख्यधारा में लाया जाता तो नेताओं को वोट मांगने की जरूरत ही नहीं पड़ती। इस स्थिति में अब बदलाव स्वाभाविक है और इसका असर वर्ष 2027 से स्पष्ट दिखाई देगा।
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