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धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर समाज सेवी अनिल प्रजापति ने उठाए तीखे सवाल

अनिल कुमार प्रजापति

उत्तर प्रदेश के संतकबीरनगर जिले के समाज सेवी अनिल कुमार प्रजापति ने पूर्व केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और उनके समर्थन में आए कुर्मी समाज के कुछ लोगों पर तीखा हमला बोला है। अनिल प्रजापति का कहना है कि सत्ता संरक्षण प्राप्त लोगों के उकसावे पर कुर्मी बिरादरी के कुछ लोग धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से दुःखी और अपमानित महसूस कर रहे हैं, जबकि धर्मेंद्र प्रधान कुर्मी बिरादरी से नहीं बल्कि चासा जाति से आते हैं। उन्होंने कहा कि यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन एक सुनियोजित व्यूह है और बढ़ते सवर्ण विरोध पर सुप्रीम कोर्ट का स्टे भी एक योजनाबद्ध चाल है ताकि ओबीसी वर्ग प्रभावित हो सके।

अनिल प्रजापति ने कुर्मी और ओबीसी समाज से सवाल पूछते हुए कहा कि दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों में कुर्मी या अन्य ओबीसी प्रिंसिपल की संख्या शून्य है और केंद्रीय विश्वविद्यालयों में ओबीसी या ईबीसी वाइस चांसलर नगण्य हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) को लागू करवाने में धर्मेंद्र प्रधान का बहुत बड़ा हाथ रहा है, जो वंचित, अतिपिछड़े, उपेक्षित और भूमिहीन मजदूर वर्गों के लिए बेहद खतरनाक साबित होने वाली है। उनका कहना है कि जो काम संघ दो ब्राह्मण मंत्रियों—प्रकाश जावड़ेकर और रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के जरिए पूरा नहीं करवा पाया, वह एक ओबीसी चेहरा सामने रखकर करवा लिया गया। इसमें रणनीतिक तरीके से मंत्री ओबीसी तो सचिव जोशी बनाए गए और बाद में मंत्री जोशी तथा सचिव गंगवार (ओबीसी) को बनाया गया।

पोस्ट में यह भी आरोप लगाया गया है कि दिल्ली में एक उड़िया ब्राह्मण को खुला हाथ देकर सभी नियमों को दरकिनार करते हुए उड़िया प्रिंसिपल बनाए गए, जिनमें एक भी ओबीसी नहीं था। इसके बावजूद धर्मेंद्र प्रधान के हटने पर एक भी उड़िया उनके समर्थन में सड़क या सोशल मीडिया पर नहीं आया। प्रजापति ने स्पष्ट किया कि नीट-यूजी में आरक्षण कोर्ट के जरिए हुआ था, जबकि केवीएस और एनएफ ओबीसी फेलोशिप में आरक्षण उनके कार्यकाल से पहले हुआ था। धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल में वंचितों के लिए शिक्षा को बहुत महंगा कर दिया गया। उन्होंने कहा कि सवर्णों के निशाने पर आने और आंदोलन में पर्दे के पीछे से एबीवीपी, लेफ्ट, राइट, कांग्रेस और लिबरल सवर्ण प्रोफेसरों का समर्थन होने के बावजूद, धर्मेंद्र प्रधान केवल अपनी करनी के कारण ही गए हैं क्योंकि उन्होंने उत्तर भारत में अपने वर्ग या संस्थाओं में कोई बैकअप तैयार नहीं किया था।



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