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उत्तर प्रदेश के संतकबीरनगर जनपद के मगहर में स्थित संत कबीर कताई मिल में बालश्रम की खुलेआम धज्जियां उड़ रही हैं। यहाँ बिना किसी खौफ के नाबालिग बच्चे ईंटों की सफाई का काम कर रहे हैं, जिसके बदले उन्हें नाम मात्र का मेंहनताना दिया जा रहा है। जिन मासूमों के हाथों में इस उम्र में कॉपी-किताबें होनी चाहिए थीं, वे अपने घरों से दूर यहाँ आकर हथौड़े चलाने को मजबूर हैं।
दरअसल, मगहर में पांच दशक पहले हथकरघा उद्योग को बढ़ावा देने के लिए इस कताई मिल की स्थापना की गई थी। लगभग दो दशक तक यह मिल शानदार तरीके से चली और इससे हजारों लोगों को रोजगार मिला, लेकिन साल 1997 में मजदूर और मिल प्रबंधन के बीच हुए विवाद के बाद यहाँ ताला लग गया। अब प्रदेश सरकार बंद पड़ी मिलों की कीमती जमीनों पर टेक्सटाईल पार्क बनाने का निर्णय ले चुकी है, जिसके तहत मिल के गोदामों व भवनों को तोड़ने और सफाई का काम चल रहा है। इसी सफाई कार्य में बड़े पैमाने पर बाल मजदूरों को काम पर लगाया गया है।
मिल में ईंटों की सफाई कर रहे बाल मजदूरों ने बताया कि वे लखीमपुर खीरी से यहाँ मजदूरी करने आए हैं और उनकी संख्या करीब पचास है। इन बच्चों को दो हजार ईंटें साफ करने के बदले मजदूरी के रूप में मात्र छह सौ रुपये मिल रहे हैं। सरकार द्वारा बालश्रम रोकने के लिए तमाम तरह की योजनाएं और जागरूकता अभियान चलाने के दावों के बीच इस तरह खुलेआम नाबालिगों से काम कराया जाना कई सवाल खड़े करता है। ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि इस बालश्रम का असली जिम्मेदार कौन है?
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