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शिल्पकार समाज अपने संवैधानिक आरक्षण के अधिकारों को लेकर संघर्षरत है, जिसे लेकर अनिल कुमार प्रजापति ने समाज से एकजुट होने की अपील की है। शिल्पकारों को सृष्टि के प्रथम इंजीनियर और सभ्यता के निर्माता के रूप में रेखांकित करते हुए, अनिल कुमार प्रजापति ने आरोप लगाया है कि समाज को जातियों में बांटकर लंबे समय से हाशिए पर धकेला गया है। उन्होंने 1931 की जनगणना और 1936 में ब्रिटिश हुकूमत द्वारा ‘एक्सटीरियर कास्ट’ घोषित किए जाने का उल्लेख करते हुए बताया कि 1950 में डॉ. भीमराव अंबेडकर और डॉ. रत्नप्पा कुम्हार के प्रयासों से समाज को अनुसूचित जाति (SC) में स्थान मिला था, लेकिन 1957 से अधिकारों में कटौती का दौर शुरू हो गया।
वर्तमान विवाद के केंद्र में 17 अतिपिछड़ी जातियों को SC के समान अधिकार देने की मांग है। 31 दिसंबर 2016 को सपा सरकार द्वारा राज्यपाल की संस्तुति पर इन जातियों को पिछड़ी सूची से बाहर कर SC के समान अधिकार देने का निर्णय लिया गया था, परंतु तकनीकी पेंच के कारण NIC पोर्टल पर इनका नाम आज भी ओबीसी में दर्ज है। फरवरी 2025 में संतकबीरनगर के तत्कालीन डीएम महेंद्र सिंह तंवर ने उत्तराखंड की तर्ज पर कुम्हार/शिल्पकार आरक्षण देने का आदेश दिया था, लेकिन राजनीतिक दबाव के चलते उनका स्थानांतरण कर दिया गया और मामले को उलझा दिया गया।
वर्तमान में यह मामला राज्य स्तरीय अपील में लंबित है और भारत सरकार के सामाजिक न्याय मंत्रालय ने भी प्रमुख सचिव को अनुपालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है। अब इस संवैधानिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर करने की तैयारी है। अनिल कुमार प्रजापति ने इस लड़ाई को समाज के हर बच्चे के भविष्य से जोड़ते हुए इसे ‘आरक्षण लेकर रहेंगे’ के संकल्प के साथ आगे बढ़ाने का आह्वान किया है।
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