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उत्तर प्रदेश में राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग द्वारा कुम्हार समेत शोषित वंचित अति पिछड़े समाज की समस्याओं से संबंधित एक प्रत्यावेदन को ‘कार्यक्षेत्र से बाहर’ बताकर निक्षेप करने के फैसले पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। अति पिछड़ा एकीकरण महाअभियान के मुख्य राष्ट्रीय संयोजक अनिल कुमार प्रजापति ने माननीय सरकार और मंत्रीगण से निवेदन करते हुए आरोप लगाया है कि आयोग ने 10 जून 2025 की बैठक में इस प्रकरण को यह कहते हुए कार्रवाई के अयोग्य बताया कि इसके बिंदु उसके कार्यक्षेत्र से बाहर हैं और इसे निक्षेप कर दिया गया।
इस ‘कागजी निस्तारण’ को अन्यायपूर्ण बताते हुए, याचिकाकर्ताओं ने तीन मुख्य सवाल किए हैं: पहला, यदि यह प्रकरण आयोग के कार्यक्षेत्र से बाहर है, तो यह किसके अधीन है और इसे संबंधित विभाग या आयोग को क्यों नहीं भेजा गया, बल्कि सीधे फाइल बंद कर दी गई? दूसरा, दोहरे मापदंड क्यों अपनाए जा रहे हैं, जबकि गरीब सवर्णों को रातोंरात आरक्षण दिया जा सकता है, तो वंचित, अतिपिछड़े और उपेक्षित वर्गों को संवैधानिक आरक्षण क्यों नहीं मिल रहा? तीसरा, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का क्या होगा, जिसमें कानून सभी के लिए बराबर होने की बात कही गई है?
इन सवालों के साथ, अति पिछड़ा समाज ने तीन प्रमुख मांगें रखी हैं: पहला, इस प्रकरण को तत्काल संबंधित सक्षम प्राधिकारी को भेजा जाए; दूसरा, अति पिछड़े वर्गों की समस्याओं का समयबद्ध निस्तारण हो; और तीसरा, वंचितों को संवैधानिक आरक्षण का लाभ मिले। इस अपील में स्पष्ट किया गया है कि यह लड़ाई किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि कुम्हार, निषाद, प्रजापति समेत पूरे अति पिछड़े समाज के सम्मान और अधिकार की है, जिसके लिए शिक्षा, जनजागरण और सामाजिक एकजुटता ही एकमात्र रास्ता बताया गया है। उन्होंने सरकार तक आवाज पहुंचाने और इस संदेश को साझा करने का आह्वान भी किया है।
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