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संतकबीरनगर, उत्तर प्रदेश से एक जिम्मेदार नागरिक ने देश के ‘सिस्टम’ की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं, जिसमें शासन/प्रशासन, सरकार/राजनीति, मीडिया और न्यायपालिका को चार ऐसे तंत्र बताया गया है जहाँ भ्रष्टाचार, भय और मजबूरियाँ एक कड़वी सच्चाई बन गई हैं। उनके अनुसार, शासन और प्रशासन में कई अधिकारी संविधान के अनुसार अच्छा काम करना चाहते हैं, लेकिन सत्ता की राजनीति में माहिर कुछ ‘धनबली प्रभावशाली’ लोग उनका गला घोंट देते हैं, जिसके कारण अधिकारियों को नौकरी बचाने के लिए ‘जी हुजूरी’ करने पर मजबूर होना पड़ता है, भले ही वे सही-गलत जानते हों। इसी तरह, सरकार और राजनीति में, चाहे पक्ष हो या विपक्ष, पार्टी की बदनामी से बचने के लिए सच को अक्सर छिपाना पड़ता है। मीडिया भी इस स्थिति से अछूता नहीं है, जहाँ छोटे पत्रकार महंगाई और बेरोजगारी से जूझते हुए कई बार सच को दबाने और ‘पैसे’ को हावी होने देने पर विवश होते हैं। अंत में, न्यायपालिका में भी न्याय सबूतों पर आधारित होता है, लेकिन जब निचली स्तर पर ही जांच अधिकारी भ्रष्टाचार में लिप्त हों, तो न्यायाधीशों के हाथ बंध जाते हैं और फाइल कमजोर हो जाती है।
इस पूरी स्थिति का गंभीर परिणाम यह है कि समाज में भय, भूख, भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी और भेदभाव लगातार बढ़ रहे हैं। इस जटिल समस्या का समाधान ‘शिक्षा + जनजागरण + सामाजिक एकजुटता’ में बताया गया है, यह रेखांकित करते हुए कि जब तक लोग जागेंगे नहीं, सवाल नहीं पूछेंगे और एकजुट नहीं होंगे, तब तक कोई बदलाव संभव नहीं है। लेखक ने चेतावनी दी है कि आज यदि अन्याय किसी और के साथ हो रहा है, तो कल यह किसी के भी साथ हो सकता है, इसलिए आवाज उठाना अत्यंत आवश्यक है। इस संदर्भ में, उन्होंने विशेष रूप से बच्चों के भविष्य का जिक्र करते हुए वादा किया है कि उनका सत्र या भविष्य बर्बाद नहीं होगा और एक ‘ठोस रणनीति’ के साथ 6 जुलाई को स्कूल अवश्य खुलेगा।
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