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वंचित, अतिपिछड़े, उपेक्षित, भूमिहीन और मजदूरी करने वाले समुदायों के बीच बढ़ते रुझान को देखते हुए, 2027 के चुनावों से पहले एक बार फिर से ‘चुनावी दलालों’ और ‘पुछड़ियों के पुछड़िया लोडर’ द्वारा आरक्षण का खेल शुरू होने का आरोप लगाया गया है। इस बार शिल्पकार, मझवार, तुरैहा, गोंड, धनगर और दुसाध आरक्षण को लेकर फिर से शोर मचाया जा रहा है, जहाँ भीड़ जुटाकर टिकट या मनोनीत पद प्राप्त कर लेने के बाद अगले पाँच साल तक जनता से गायब रहने की पुरानी कहानी दोहराई जा रही है। इसका सार ‘अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता’ के रूप में व्यक्त किया गया है।
वंचित और अतिपिछड़ी जातियों के पढ़े-लिखे और जागरूक कार्यकर्ताओं ने इन तथाकथित ‘दलालों’ से तीखे सवाल पूछे हैं: उनका ‘आरक्षण दिलाने’ का खेल केवल चुनाव के समय ही क्यों शुरू होता है? यदि उनमें क्षमता है, तो वे अपने जिले के जिलाधिकारी से एक आदेश जारी करवाकर दिखाएँ, क्योंकि जाति प्रमाण पत्र डीएम के नियंत्रण में तहसीलों से जारी होते हैं, माइक पर नहीं। उन्हें कमिश्नर से लड़ते हुए शासन स्तर तक पहुँचने और सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार का आदेश दिखाने की चुनौती दी गई है। यह भी पूछा गया है कि यदि वे ऐसा नहीं कर सकते, तो जनता को गुमराह क्यों करते हैं?
‘अतिपिछड़ा एकीकरण महाअभियान’ ने स्पष्ट किया है कि शिल्पकार आरक्षण, जो वंचित अतिपिछड़ी जातियों का मुख्य आधार है, उसे लेकर पूरे देश में आज तक उनके ‘महाअभियान’ के अलावा कोई संवैधानिक लड़ाई अनुच्छेद 341 के अनुपालन में नहीं लड़ पाया है। यह भी बताया गया कि नियमानुसार शासन स्तर से होते हुए मा. उच्च न्यायालय में दस्तावेज प्रस्तुत करने की प्रक्रिया चल रही है। इसके विपरीत, जातिगत गुटबाजी के शिकार इन पार्टीगत दलालों ने इस आंदोलन में एक रुपये का भी सहयोग नहीं किया, बल्कि हमेशा विरोध ही किया। अब चुनाव नजदीक आते ही वे माइक, मीडिया और सोशल मीडिया पर ‘आरक्षण दिला रहे हैं’ का दावा कर रहे हैं।
यह घोषणा की गई है कि अब और नहीं सहा जाएगा, और इन ‘वोट बेचवों’ तथा इनके ‘आकाओं’ का सामाजिक बहिष्कार करने का समय आ गया है। ‘वंचित अतिपिछड़े का आधार – शिल्पकार आरक्षण हमारा जन्म सिद्ध अधिकार’ के नारे के साथ, अनिल कुमार प्रजापति, संस्थापक, अतिपिछड़ा एकीकरण महाअभियान संतकबीरनगर, उत्तर प्रदेश, ने इस अन्याय के खिलाफ एक मजबूत रुख अपनाने की बात कही है।
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