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बस्ती के रुधौली तहसील के दसिया में आकार ले रही एक नई एथेनॉल फैक्ट्री को लेकर क्षेत्रवासियों में भारी चिंता का माहौल है, जहाँ यह बड़ा यक्ष प्रश्न बन गया है कि क्या यह फैक्ट्री आने वाले दिनों में उनके लिए जीवनदायिनी साबित होगी या जानलेवा। इस आशंका को उत्तर प्रदेश के ही लखीमपुर जिले से जुआरी इंडस्ट्रीज की एथेनॉल फैक्ट्री से आ रही भयावह तस्वीरें और मजबूत कर रही हैं, जिन्हें दसिया और पूरे रुधौली क्षेत्र के भविष्य के लिए ‘रोंगटे खड़े कर देने वाला’ बताया गया है। लखीमपुर में एथेनॉल निर्माण ने महज कुछ सालों के भीतर पूरे क्षेत्र के पानी को ‘जहर’ बना दिया है, हवा में ‘बारूद घोल’ दिया है और घर-घर में ‘चर्म रोग की महामारी’ फैला दी है, जिससे यह डर सता रहा है कि क्या दसिया (रुधौली) भी इसी विनाशकारी रास्ते पर आगे बढ़ रही है।
लखीमपुर में जुआरी एथेनॉल प्लांट के महज 300 मीटर के दायरे में आने वाले गाँवों का भूजल पूरी तरह बर्बाद हो चुका है और पीने लायक नहीं बचा है। जो लोग आर्थिक रूप से सक्षम हैं, वे आरओ लगवा कर या पानी खरीदकर अपनी जान बचा रहे हैं, लेकिन गरीब जनता प्रदूषित और बदबूदार पानी पीने को मजबूर है। क्षेत्र में मक्खियों और मच्छरों का ऐसा तांडव है कि वहाँ जीना दूभर हो गया है। आरोप है कि अरबों कमाने वाली इस कंपनी ने कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) के तहत स्थानीय स्तर पर शुद्ध पानी के लिए एक भी आरओ प्लांट नहीं लगाया, बल्कि सीएसआर फंड को दूसरे राज्यों की तिजोरियों में भेजा जा रहा है। वहीं, जनता के वोट पर ऐश करने वाले स्थानीय नेताओं और जनप्रतिनिधियों को ‘बिकाऊ, भ्रष्ट और निठल्ले’ साबित करते हुए उन पर जनता की सिसकियों से ज्यादा अपनी जेबें गर्म करने में दिलचस्पी रखने का आरोप लगाया गया है।
लखीमपुर की इन भयावह स्थितियों को देखते हुए, दसिया (रुधौली) की जनता अब बस्ती के जिलाधिकारी (DM) और क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों से सीधे और तीखे सवाल पूछ रही है। क्षेत्र के सजग नागरिकों ने प्रशासन के बंद कमरों की खामोशी पर सवाल उठाते हुए पूछा है कि क्या दसिया (रुधौली) में इस नई एथेनॉल फैक्ट्री को ‘अनापत्ति प्रमाण पत्र’ (NOC) देने से पहले लखीमपुर जैसे जमीनी हालात का अध्ययन किया गया, या फिर केवल कागजी कागजात चमकाकर एनओसी बांट दी गई? उन्होंने यह भी पूछा है कि प्रदूषण विभाग के पास इस बात की क्या गारंटी है कि दसिया में फैक्ट्री चालू होने के बाद यहाँ का भूजल और पर्यावरण दूषित नहीं होगा, और क्या विभाग ने ‘ज़ीरो लिक्विड डिस्चार्ज’ (ZLD) मानकों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित कराया है।
जनता ने जिलाधिकारी से यह भी जानना चाहा है कि क्या प्रशासन इस कंपनी को मजबूर करेगा कि वह काम शुरू करने से पहले ही सीएसआर फंड का एक बड़ा हिस्सा दसिया और रुधौली के प्रभावित होने वाले गाँवों में शुद्ध पेयजल, स्वास्थ्य और शिक्षा पर खर्च करे, या लखीमपुर की तरह यहाँ की गाढ़ी कमाई भी दूसरे राज्यों में उड़ाने की खुली छूट मिलेगी। नागरिकों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि अगर आने वाले चंद सालों में दसिया (रुधौली) के गाँवों का पानी काला और हवा जहरीली हो गई, तो इसकी नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी प्रदूषण विभाग की, जिला प्रशासन की या फिर एसी कमरों में ‘मौज काट रहे’ स्थानीय नेताओं की होगी। जनता पूछ रही है कि जब एथेनॉल फैक्ट्रियां पर्यावरण और मानव जीवन को इस कदर तबाह कर रही हैं, तो स्थानीय प्रशासन गहरी नींद में क्यों सोया है, और क्या बस्ती के नेता भी लखीमपुर के नेताओं की तरह ‘रीढ़विहीन’ होकर तमाशा देखेंगे, या समय रहते इस आगामी विनाश के खिलाफ कोई ठोस कदम उठाएंगे। उन्हें चेताया गया है कि अगर आज दसिया और रुधौली की जनता और प्रशासन नहीं जागा, तो आने वाली पीढ़ियां पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसेंगी और अस्पतालों के चक्कर काटने को मजबूर होंगी।
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