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बस्ती के हरैया नगर पंचायत में 417.78 लाख रुपये की लागत से बनी ‘आसरा आवास’ परियोजना सरकारी धन की बर्बादी और भ्रष्टाचार का एक बड़ा उदाहरण बनकर सामने आई है। चार मंजिला यह इमारत हैंडओवर होने से पहले ही खंडहर में तब्दील हो चुकी है, जहाँ अंधेरा, गंदगी और दीवारों में दरारें स्पष्ट देखी जा सकती हैं। निर्माण की इस बदहाली के चलते नगर पंचायत प्रशासन ने अब तक इसे हैंडओवर लेने की हिम्मत नहीं जुटाई है।
वर्ष 2015-16 में समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान कंस्ट्रक्शन एंड डिजाइन सर्विसेज (संतकबीरनगर यूनिट-20) द्वारा निर्मित इस भवन की गुणवत्ता पर शुरुआत से ही सवाल उठते रहे हैं। आलम यह है कि नींव की ईंटें ठीक से जमी भी नहीं थीं कि भ्रष्टाचार की दरारें दीवारों पर दिखने लगीं। कागजों पर यह ‘आसरा’ भले ही सुविधा का प्रतीक हो, लेकिन यहाँ रहने वाले 84 परिवारों के लिए यह किसी नरक से कम नहीं है। ये परिवार अवैध ‘कटिया’ के सहारे अंधेरे में जीने को मजबूर हैं और पानी की टंकी सिर्फ दिखावा है, जिससे महिलाओं को एक सरकारी हैंडपंप के लिए लंबी जद्दोजहद करनी पड़ती है। निवासियों के अनुसार, साफ-सफाई का नामोनिशान नहीं है और बीमारियों का डर हमेशा बना रहता है।
कोरोना काल में तत्कालीन एसडीएम द्वारा आनन-फानन में किए गए आवंटन ने इन परिवारों को मुश्किल में डाल दिया। ‘दिशा’ समिति की बैठक में दिए गए कड़े प्रशासनिक अल्टीमेटम की समय-सीमा बीत चुकी है, फिर भी जिम्मेदार अधिकारी केवल ‘पत्राचार’ का खेल खेलकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहे हैं। डूडा के परियोजना अधिकारी का यह कहना कि ‘कुछ कमियां रह गई थीं’, उन परिवारों के लिए एक क्रूर मजाक जैसा है जो अपनी जान जोखिम में डालकर दरारों से भरी दीवारों के बीच रहने को मजबूर हैं। सवाल उठाया जा रहा है कि आखिर 417 लाख रुपये सरकारी खजाने से इसलिए खर्च किए गए थे कि कुछ ही वर्षों में इमारत जर्जर हो जाए और निर्माण कंपनी पर अब तक कोई कठोर कार्रवाई क्यों नहीं हुई। प्रशासनिक उदासीनता के ऐसे आलम में, जब विकास के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, यह देखना बाकी है कि शासन-प्रशासन की नींद कब टूटेगी, या यह मामला एक बार फिर फाइलों में ही दबकर रह जाएगा।
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