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बस्ती कलेक्ट्रेट स्थित एडीएम कार्यालय में हाल ही में हुए व्यापक प्रशासनिक फेरबदल ने जिले के प्रशासनिक गलियारों में खलबली मचा दी है। इस कार्रवाई को कार्यालय में जमी ‘गंदगी’ को साफ करने के ‘व्हाइटवॉश’ अभियान के रूप में देखा जा रहा है। एडीएम कार्यालय में स्टेनो से लेकर पेशकार तक के स्तर पर एक साथ किए गए इन तबादलों ने पूरे कलेक्ट्रेट को हैरान कर दिया है, क्योंकि इतनी बड़ी संख्या में तबादलों की उम्मीद किसी ने नहीं की थी।
जानकारों का मानना है कि यद्यपि कार्यालय में शिकायतों का सिलसिला पहले से जारी था, लेकिन ‘अर्दली कांड’ के सामने आने के बाद इन तबादलों ने और अधिक जोर पकड़ लिया। इस घटना ने सरकारी कार्यालयों की कार्यप्रणाली को लेकर कड़े सवाल खड़े किए हैं, विशेषकर गोपनीयता और पद के दुरुपयोग को लेकर, जिसमें साहबों के सबसे करीब होने के कारण अर्दली और पेशकार की मुख्य भूमिका बताई गई है। यह भी कटाक्ष किया गया है कि अधिकारी अक्सर ऐसे ही कर्मचारियों को तरजीह देते हैं जो उनकी सही-गलत जरूरतों को पूरा कर सकें, जिससे ‘पटल परिवर्तन’ जैसे अनिवार्य नियमों की अनदेखी होती है और कर्मचारी पटल को अपनी ‘जागीर’ समझने लगते हैं, जैसा कि पीडब्ल्यूडी के टेंडर बाबू के उदाहरण में बताया गया है जो सालों से एक ही पटल पर जमे हैं।
इस कार्रवाई को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हैं; कई लोग इसे महज एक तबादला न मानकर किसी बड़ी साजिश का हिस्सा मान रहे हैं और यह जानने के लिए उत्सुक हैं कि आखिर इतने बड़े अधिकारियों के खिलाफ साजिश किसने रची। राजनीतिक गलियारों में भी इन तबादलों की जमकर चर्चा है और अधिकारी भी राजनीतिक दखलंदाजी से परेशान नजर आते हैं। गोपनीयता और पारदर्शिता बनाए रखने के लिए अर्दली और पेशकार को निश्चित अंतराल पर बदलना अनिवार्य बताया गया है। फिलहाल, यह देखना बाकी है कि एडीएम कार्यालय में हुआ यह फेरबदल प्रशासनिक सुधार है या यह केवल एक अस्थायी दिखावा बनकर रह जाएगा।
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