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बस्ती में प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा अपनी छवि बचाने के लिए खुद रिश्वत न लेकर अपने ‘अर्दली’ और ‘पेशकार’ के माध्यम से रिश्वत लेने का चलन प्रशासनिक तंत्र की गरिमा को गहरा आघात पहुँचा रहा है। यह स्थिति अधिकारियों की गिरती साख को दर्शाती है, जहाँ वे जनता और रिश्वत देने वालों, दोनों की नजरों में अपना मान-सम्मान खो चुके हैं।
राजस्व और चकबंदी विभाग में न्याय पाने की उम्मीद में लोग अपनी सारी जमा-पूंजी और सांसें गंवा देते हैं, क्योंकि कई अधिकारी रिश्वत लेने के बाद भी फरियादियों को परेशान करते हैं, जिससे वे श्रद्धा के बजाय विरोध पर मजबूर हो जाते हैं। यह स्थिति पहले के ईमानदार और मानवीय संवेदनाओं से भरे अधिकारियों के विपरीत है, जो गरीब किसानों की मदद करते थे और अपनी जेब से भी सहायता देते थे। लेख में कीर्तिप्रकाश भारती जैसे अधिकारियों को याद किया गया है, जिनके कार्यकाल में न तो अर्दली की मनमानी चलती थी और न ही पेशकार की, और वे गरीब फरियादियों की आर्थिक मदद भी करते थे। लेख स्पष्ट करता है कि ईमानदारी बाजार में बिकने वाली वस्तु नहीं, बल्कि संस्कारों और विरासत से मिलती है, हालांकि व्यवस्था में आने के बाद कुछ अधिकारी अपनी पद की गरिमा भूलकर भ्रष्टाचार का मार्ग अपना लेते हैं।
इस भ्रष्टाचार का सबसे दुखद पहलू अधिकारियों के पारिवारिक जीवन पर पड़ता है, जहाँ उनके बच्चे उन्हें भ्रष्टाचार में लिप्त देखकर पिता के रूप में उनका सम्मान खो देते हैं। लेख का निष्कर्ष है कि यदि अधिकारी अपनी कार्यशैली में सुधार नहीं करते और न्याय की कुर्सी की गरिमा को नहीं समझते, तो वे समाज और परिवार, दोनों की नजरों में अपमानित होंगे। यह समय की मांग है कि प्रशासनिक अधिकारी जन-सेवा के मूल उद्देश्य को समझकर भ्रष्टाचार के इस जाल से खुद को बाहर निकालें।
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