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पूर्वांचल के गोरखपुर, देवरिया, महराजगंज, कुशीनगर और सिद्धार्थनगर जिलों के गांवों में लाखों दलित, पिछड़े और गरीब परिवार 2024-2025 में समूह कर्ज के जाल में बुरी तरह फंस गए थे। इन ऋणों पर मासिक 2-3% का भारी ब्याज लिया जाता था, जो सालाना 24-40% तक पहुँच जाता था। कर्ज वसूली एजेंट हफ्तों में दो बार घरों पर आते थे और गाली-गलौज करते हुए बर्तन व गहने तक उठा ले जाते थे। एक भी किस्त में देरी होने पर ₹500-1000 का जुर्माना लगता था, साथ ही गांव में बदनामी का सामना करना पड़ता था। इस उत्पीड़न से तंग आकर पूर्वी उत्तर प्रदेश में सैकड़ों गरीब महिलाओं और पुरुषों ने आत्महत्या कर ली, लेकिन कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं हुई। सरकार तब हरकत में आई जब श्रवण कुमार निराला ने इस गंभीर मुद्दे को उठाया।
श्रवण कुमार निराला ने इन परिवारों को “मुक्ति” दिलाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। जनवरी 2024 में, उन्होंने गोरखपुर के जिलाधिकारी कार्यालय और मुख्यमंत्री के आवास के सामने 5000 से अधिक महिलाओं के साथ ‘जेल भरो आंदोलन’ के तहत धरना प्रदर्शन किया। इस आंदोलन की तीन मुख्य मांगें थीं: ब्याज माफ करना, जबरन वसूली बंद करना और एजेंटों पर प्राथमिकी दर्ज करना। इस मुद्दे को 54 दिनों तक उठाने के कारण सरकार ने निराला को जेल भेज दिया, जिसके बाद यह मामला प्रदेश और देश की मीडिया में प्रमुखता से आया। इसके अतिरिक्त, अंबेडकर जन मोर्चा की टीम ने 200 से अधिक गांवों में “वसूली रोक” अभियान चलाया, जहाँ महिलाओं को उनके कानूनी अधिकारों के बारे में बताया गया कि रात 8 बजे के बाद कोई भी वसूली नहीं कर सकता और घर में जबरन घुस नहीं सकता। धमकी मिलने पर कार्यकर्ता 2 घंटे के भीतर गांव पहुँचते थे, जिससे दर्जनों जगहों पर वसूली रुकवाई गई।
आंदोलन के बाद, सरकार पर बढ़ते दबाव का परिणाम यह हुआ कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने 2024 में नई गाइडलाइन जारी की, जिसमें रात में वसूली पर प्रतिबंध लगाया गया और जबरन वसूली करने वाली कंपनियों के लाइसेंस रद्द करने का प्रावधान किया गया। कई जिलों के जिलाधिकारियों ने माइक्रोफाइनेंस कंपनियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने के निर्देश भी दिए। दबाव के चलते कई कंपनियों ने जुर्माने माफ कर किस्तों को फिर से निर्धारित किया। इस पूरी प्रक्रिया के बाद, कर्ज अधिकतम स्तर तक कम हो गया और शोषण व उत्पीड़न में भारी कमी आई। जहाँ पहले एजेंट मालिक और गुंडे की तरह व्यवहार करते थे, वहीं अब महिलाएं “निराला भैया को बुलाऊं?” कहकर उन्हें चुप करा देती हैं। गांवों में आज भी लोग कहते हैं कि “सरकार और बैंक तो सो रहे थे, श्रवण कुमार निराला ने हमें जगाया और लड़ना सिखाया,” यही कारण है कि लाखों परिवार उन्हें “गरीबों का मसीहा” मानते हैं। श्रवण कुमार निराला को पूर्वांचल में सबसे अधिक पहचान इसी मुद्दे से मिली, क्योंकि उन्होंने गरीब जनता के लिए जेल की कालकोठरी की सजा काटी, अपने लिए नहीं।
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