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उत्तर प्रदेश में जनप्रतिनिधियों को अपनी ही प्रशासनिक व्यवस्था के खिलाफ सड़कों, थानों और बिजली दफ्तरों के आगे धरने पर बैठने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है, जिससे सुशासन के दावों पर गंभीर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं। अजीत मिश्रा (खोजी) के इस संपादकीय में शासन के सुस्त तंत्र की विफलता और व्यवस्था के लाचारपन को खुलकर उजागर किया गया है, जहां जनता की समस्याओं का समाधान कराने वाले जनप्रतिनिधि खुद प्रशासनिक मनमानी का शिकार होकर अपमानित महसूस कर रहे हैं।
इस प्रशासनिक अराजकता के पीछे कई गंभीर पहलू सामने आए हैं, जिनमें पुलिस प्रशासन द्वारा व्यापारियों का कथित उत्पीड़न और बिजली विभाग की मनमानी से उपभोक्ताओं का त्रस्त होना प्रमुख है। प्रशासनिक अधिकारियों की संवादहीनता इस कदर बढ़ गई है कि वे जनप्रतिनिधियों की जायज शिकायतों को भी लगातार नजरअंदाज कर रहे हैं, जिसके कारण बातचीत के सारे रास्ते बंद हो चुके हैं और धरना ही विरोध का अंतिम जरिया बनकर रह गया है। निचले स्तर पर जवाबदेही के घोर अभाव और पुलिस महकमे के कुछ सिपाहियों द्वारा व्यापारियों के उत्पीड़न ने तंत्र के प्रति जनप्रतिनिधियों के भरोसे को पूरी तरह तोड़ दिया है, जिसके चलते उन्हें थाना परिसर में बैठने तक की चेतावनी देनी पड़ रही है।
यह पूरी स्थिति एक चुनी हुई सरकार में सुशासन के दावों और धरातल की कड़वी हकीकत के बीच की चौड़ी खाई को दर्शाती है। प्रशासन को अपनी कार्यशैली पर आत्ममंथन करने की सख्त जरूरत है क्योंकि अधिकारियों की इस उदासीनता का खामियाजा अंततः आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। आखिर कब तक जनप्रतिनिधियों को विकास के कार्यों को छोड़कर अपने ही तंत्र के खिलाफ सड़क पर संघर्ष करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, यह एक ऐसा गंभीर प्रश्न है जो तत्काल उत्तर मांगता है।
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