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देश में पेपर लीक की बढ़ती घटनाएं अब महज एक अपराध नहीं, बल्कि करोड़ों युवाओं के सपनों की क्रूर हत्या बन चुकी हैं। उत्तर प्रदेश के बस्ती मंडल से लेकर विभिन्न हिस्सों तक, यह गोरखधंधा एक भयावह उद्योग का रूप ले चुका है, जहां दिन-रात मेहनत करने वाले ईमानदार छात्रों की डिग्री के ऊपर माफियाओं की बिकाऊ पहुंच हावी हो रही है। जब एक प्रश्नपत्र लीक होता है, तो छात्र की वर्षों की तपस्या, माता-पिता की उम्मीदें और देश का भविष्य बिक जाता है। इससे सरकारी भर्ती परीक्षाओं की सुरक्षा पर बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं और पूरा सरकारी सिस्टम ‘सफेद हाथी’ साबित हो रहा है।
इस भ्रष्टाचार के कारण पुस्तकालयों और कमरों में दिन-रात मेहनत करने वाले छात्रों का आत्मविश्वास टूट रहा है और वे मानसिक अवसाद का शिकार हो रहे हैं। बार-बार परीक्षाओं के रद्द होने से अभ्यर्थियों का आर्थिक और मानसिक शोषण हो रहा है। वहीं, चोर दरवाजे से अयोग्य लोगों के सरकारी पदों पर काबिज होने से प्रशासनिक गुणवत्ता पर सीधा प्रहार हो रहा है। इस व्यवस्था के लीक होने के पीछे सरकारी तंत्र और माफियाओं की साठगांठ है। आधुनिक तकनीकी विफलता और दोषियों को सख्त सजा न मिलने के कारण कानून का डर पूरी तरह खत्म हो चुका है, जिससे नए गिरोह लगातार पैदा हो रहे हैं।
लोकतंत्र में इस बदहाली को लेकर सीधे सत्ता से जवाबदेही मांगी जा रही है। ऐसी नीतियों की मांग उठ रही है जो ‘जीरो टॉलरेंस’ (शून्य सहनशीलता) के सिद्धांत पर काम करें। इसके समाधान के लिए समयबद्ध जांच, दोषियों के खिलाफ फास्ट-ट्रैक कोर्ट में सुनवाई और भर्ती परीक्षाओं की पारदर्शी डिजिटल निगरानी बेहद जरूरी है। जिस देश का युवा व्यवस्था से भरोसा खो देता है, उसकी नींव कभी मजबूत नहीं हो सकती; इसलिए पेपर लीक पर अब मौन रहना इस घोर अपराध में साझेदारी के समान है।
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