उत्तर प्रदेश के गांवों में ग्राम प्रधानी का चुनाव अब जनसेवा का माध्यम कम और मुनाफे का बिजनेस ज्यादा बनकर रह गया है। संत कबीर नगर से सामने आई जमीनी हकीकत के अनुसार, जिस पद को गांव के विकास की रीढ़ माना जाता था, वह आज धनबल, जातिवाद और सौदेबाजी का अखाड़ा बन चुका है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि मौजूदा प्रधान के खिलाफ 5 साल तक कोई आवाज नहीं उठाता, लेकिन जैसे ही चुनाव नजदीक आते हैं, विरोध करने वालों की लाइन लग जाती है।
गांव की जनता आज विकास के बजाय जाति के नाम पर ज्यादा वोट देती है, जिसका फायदा उठाकर अचानक धनबल हासिल करने वाले अराजक तत्व गांव का नेतृत्व करने का सपना देखने लगते हैं। इन तत्वों को गांव की बुनियादी समस्याओं जैसे सड़कों, नालियों, स्कूलों या स्वास्थ्य से कोई लेना-देना नहीं होता, बल्कि उनका एकमात्र लक्ष्य कुर्सी और रसूख हासिल करना होता है। इसके चलते योग्य और विकास चाहने वाले लोग इस चुनावी दौड़ से बाहर हो जाते हैं। चुनाव जीतने के बाद 5 साल तक कोई विपक्ष नजर नहीं आता और चुनाव में बड़े-बड़े वादे करने वाले पराजित प्रत्याशी भी गांव से गायब हो जाते हैं।
इस मिलीभगत और विपक्ष की अनुपस्थिति के कारण ग्राम पंचायत में होने वाले विकास कार्यों की गुणवत्ता की कोई जांच नहीं होती। ठेकेदार और मुखिया मिलकर कागजों पर सब कुछ अच्छा दिखाकर पेमेंट पास करा लेते हैं, जिससे कुछ ही महीनों में सड़कें उखड़ जाती हैं और हैंडपंप व नालियां टूट जाती हैं। चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे अन्य प्रत्याशी भी विकास के बजाय केवल वर्तमान प्रधान को हराने की जुगत में रहते हैं, जबकि वर्तमान मुखिया उन्हें शांत रखने के लिए ‘चारा’ डालते रहते हैं। नकली वादों और चुनावी लालच में आम जनता बार-बार मूर्ख बनती है। अगर गांवों की स्थिति बदलनी है, तो चुनाव को सेवा भाव से देखना होगा और जनता को जातिवाद से ऊपर उठकर काम करने वाले उम्मीदवार को चुनना होगा।
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