अधकचरा ज्ञान और सुनी हुई बातें इंसान के फेलियर होने का कारण बन जाती है। खबर में गौर करने योग्य बात यह है कि कहीं कुम्हार/प्रजापति शब्द का जिक्र नहीं बकिया शिल्पकार श्रेणी का अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र तो जारी हो ही रहा है प्रदेश में। इस नाते हमारे लिए ये सिद्ध करना अनिवार्य है कि कुम्हार ही शिल्पकार है और यदि कुम्हार शिल्पकार नहीं है तो शिल्पकार है कौन। यही रिपोर्ट अतिपिछड़ा एकीकरण महाअभियान के प्रत्यावेदन पर अनुसूचित जाति एवं जनजाति शोध संस्थान उत्तर प्रदेश शासन लखनऊ के शोध अधिकारी श्री देवेन्द्र सिंह जी ने भी प्रमुख सचिव समाज कल्याण विभाग को प्रेषित किया है। अतः जब लखनऊ हाईकोर्ट की बेंच ने मामला यहां तक पहुंचा ही दिया है तो मुख्य शाखा इलाहाबाद हाईकोर्ट में हमारे विद्वान अधिवक्ता श्री दीपक कुमार प्रजापति जी की टीम निर्विवाद रूप से वंचित अतिपिछड़ी जातियों के मुख्य आधार शिल्पकार आरक्षण प्रकरण को फतेह करके ही दम लेगी अर्थात उत्तर प्रदेश में उत्तराखंड के तर्ज पर शिल्पकार आरक्षण प्रकरण में एक यैसा अप्रत्याशित मोड़ आ चुका है जो पुराने सभी क्यासबाजियो पर विराम लगाते हुए एतिहासिक स्वरूप दे दिया,जिसपर शासन प्रशासन और सरकार पूरी तरह उलझ चुकी है क्योंकि अतिपिछड़ा एकीकरण महाअभियान के निरंतर संघर्षों के मद्देनजर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 341 के अनुपालन में तत्कालीन जिलाधिकारी संतकबीरनगर का स्पष्ट आदेश “कुम्हारों के पिछड़ी जाति प्रमाण पत्र पर रोक लगाते हुए शिल्पकार श्रेणी के अंतर्गत अनुसुचित जाति प्रमाण पत्र निर्गत किए जाए ” कतिपय निराधार आपत्तियों के चलते नियमानुसार राज्य स्तरीय अपील में लंबित है और सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय भारत सरकार के अनुसूचित जाति सूची संशोधन प्रकोष्ठ द्वारा सहमति की दशा में दो दो आर्डर प्रमुख सचिव समाज कल्याण विभाग उत्तर प्रदेश शासन लखनऊ को जारी होने के उपरांत निस्तारण की अवधि पार करते हुए राजनैतिक श्रेयबाजी का शिकार बना है तो सरकार की मंशा पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।🙏
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