*व्यवस्था परिवर्तन को लेकर भारतीय सियासत करवट लेने लगी है, जो बदलाव के शुभ संकेत हैं।*
बढ़ती शिक्षा और जनजागरूकता दिन-प्रतिदिन निचले पायदान को ऊपर उठाती जा रही है, इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन सदियों से जो अत्याचारी, धनबली, प्रभावशाली तबका बदस्तूर तानाशाही हुकूमत गरीब-कमजोरों पर करता चला आ रहा था, उनमें बौखलाहट बढ़ती जा रही है।
ऐसे में सरकार यदि अत्याचारी धन्नासेठों और जातिगत षड्यंत्रकारी गुटबाजों को साधने में जुटती है तो कुर्सी बचाना मुश्किल होगा।
पक्ष हो या विपक्ष, सरकार उसी की बनती है जिसके साथ बहुतायत आबादी वाला वंचित, अतिपिछड़ा, उपेक्षित वर्ग जुड़ता है। लेकिन फर्क सिर्फ इतना है कि अब लॉलीपॉप से काम नहीं चल पाएगा, बल्कि संवैधानिक हक, अधिकार और सामाजिक न्याय चाहिए।
*अन्यथा का परिणाम 2027 से ही दिखना शुरू हो जाएगा यदि वंचितों को निर्विवाद रूप से संख्यात्मक हिस्सेदारी/आरक्षण नहीं मिला तो।*
क्रीमीलेयर का सिद्धांत लागू होना चाहिए या नहीं, यह सरकार और सवर्ण समाज के साथ सक्षम व सामर्थ्यवान SC/ST/OBC के लोगों का विषय है, लेकिन शोषित वंचितों का क्या जो आज तक संवैधानिक सुविधा का लाभ पाए ही नहीं, तिरस्कार, अस्पृश्यता, असमानता, भेदभाव, शोषण और जुल्म-ज्यादती, अन्याय-उत्पीड़न के अलावा…
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