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“जैसी करनी वैसी भरनी…” के मूलमंत्र पर जोर देते हुए कहा गया है कि यदि किसी अपराधी ने जुर्म किया है, तो उसे सज़ा मिलना बेहद ज़रूरी है। यह संदेश ख़ासतौर पर बिहार पुलिस के लिए है, जिस पर आरोप है कि उसने वर्दी का नाजायज फायदा उठाकर एक समाजसेवी इंसान को “यमराज के बगैर बुलावे के” ऊपर पहुंचा दिया। इस कृत्य के बाद समाज में न्याय की मांग उठ रही है।
इस बात को पुख्ता करने के लिए एक महीने पहले के बिहार के वैशाली जिले के एक मामले का उदाहरण दिया गया है, जहाँ 84 वर्षीय दीपराय को 1992 के हत्या के एक मामले में 34 साल बाद वैशाली कोर्ट ने तीन साल के सश्रम कारावास की सज़ा सुनाई है। बताया गया है कि दीपराय की पीठ 90 डिग्री झुक गई है और उन्हें चलने के लिए सहारे की ज़रूरत पड़ती है, लेकिन 34 साल पहले, जब वह 50 वर्ष के थे, तब वे एक ‘माफिया’ थे। उन्होंने अपने पड़ोस के एक व्यक्ति को रिवॉल्वर से मार डाला था, और इससे पहले उन्होंने उस व्यक्ति और उसकी पत्नी के साथ मारपीट भी की थी। इस हत्या मामले में कुल 9 आरोपी थे, जिनमें से 4 अब इस दुनिया में नहीं हैं, जबकि बाकी 4 को 10-10 साल का कठोर कारावास मिला है। इससे यह स्पष्ट होता है कि कानून उम्र या शरीर की स्थिति नहीं देखता।
अब भरतभूषण नामक समाजसेवी की मौत पर सारा उत्तर-पूर्व भारत जाग गया है। चेतावनी दी गई है कि जब कोर्ट इन पुलिसकर्मियों को सज़ा सुनाएगी, तो कोई उनके लिए नहीं जागेगा और न ही उन्हें 7 तोपों की सलामी दी जाएगी, क्योंकि यह सलामी केवल शहीदों को मिलती है, अपराधियों को नहीं। यह भी कहा गया है कि अगर “भरततिवारी” के हाथों शहादत हो जाती, तो उन्हें भी 7 तोपों की सलामी मिल जाती। यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है, और सभी को कोर्ट के फैसले का इंतज़ार है कि वह कितने समय में क्या निर्णय सुनाती है।
अंत में यह संदेश दिया गया है कि दुनिया में न जुल्म रहेगा और न ही जालिम का दबदबा, अगर कुछ रहेगा तो वह सिर्फ प्यार होगा।
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