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स्ट्रेसफुल हैं GEN-Z की दोस्तियां: डिप्रेशन की ओर बढ़ रहे स्कूल-कॉलेज के बच्चे,
स्ट्रेसफुल हैं GEN-Z की दोस्तियां: डिप्रेशन की ओर बढ़ रहे स्कूल-कॉलेज के बच्चे, गोरखपुर में बढ़ रही काउंसलिंग की जरूरत
गोरखपुर। डिजिटल दौर में दोस्ती का तरीका तेजी से बदल रहा है। सोशल मीडिया, ऑनलाइन चैट, लगातार तुलना, पढ़ाई का दबाव और रिश्तों में अस्थिरता का असर अब स्कूल और कॉलेज जाने वाले छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर साफ दिखाई देने लगा है। मनोचिकित्सकों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में ऐसे किशोरों और युवाओं की संख्या बढ़ी है जो तनाव, चिंता, अकेलेपन और अवसाद जैसी समस्याओं के कारण काउंसलिंग लेने पहुंच रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि आज की GEN-Z दोस्तियों में भावनात्मक जुड़ाव की जगह कई बार “ऑनलाइन वैलिडेशन” और “सोशल मीडिया इमेज” अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। दोस्ती टूटने, ग्रुप से अलग होने, साइबर बुलिंग, लगातार तुलना और लाइक्स-फॉलोअर्स की होड़ से कई बच्चे मानसिक तनाव का सामना कर रहे हैं। यह तनाव समय रहते नियंत्रित न हो तो डिप्रेशन का रूप ले सकता है।
गोरखपुर में मनोचिकित्सकों का कहना है कि उनके पास ऐसे कई छात्र पहुंच रहे हैं जिन्हें पढ़ाई में मन नहीं लगता, नींद कम आती है, चिड़चिड़ापन रहता है, आत्मविश्वास घट जाता है और वे खुद को अकेला महसूस करते हैं। कुछ मामलों में अभिभावकों को भी देर से पता चलता है कि बच्चा मानसिक तनाव से गुजर रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों में यदि लंबे समय तक उदासी, दोस्तों से दूरी, पढ़ाई में गिरावट, अत्यधिक मोबाइल का उपयोग, गुस्सा, बेचैनी या आत्मविश्वास में कमी जैसे लक्षण दिखाई दें तो इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर काउंसलिंग और परिवार का सहयोग मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
मनोचिकित्सकों की सलाह है कि माता-पिता बच्चों से नियमित बातचीत करें, उनकी भावनाओं को समझें, पढ़ाई और करियर का अनावश्यक दबाव न बनाएं तथा सोशल मीडिया के उपयोग पर संतुलित निगरानी रखें। जरूरत पड़ने पर मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक से परामर्श लेने में संकोच नहीं करना चाहिए, क्योंकि समय पर उपचार और काउंसलिंग से अधिकांश बच्चे सामान्य जीवन में लौट सकते हैं।
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