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भरत जी कोई सामान्य व्यक्तित्व नहीं हैं। उनका चरित्र उस पवित्र तीर्थजल के समान है, जिसमें स्नान करने से मनुष्य पवित्र होता है। उसी प्रकार भरत जी के चरित्र का श्रवण करने से जीवन पावन हो जाता है।
मनुष्य को अपने भीतर के दोषों और दुर्गुणों का त्याग करना चाहिए। बाहरी शत्रु को कभी-कभी क्षमा किया जा सकता है, किंतु घर के भीतर प्रवेश कर चुके शत्रु को नहीं, क्योंकि वह भीतर ही भीतर पूरे परिवार को खोखला कर देता है: कथाव्यास आचार्य शांतनु जी महाराज
भरत जी कोई सामान्य व्यक्तित्व नहीं हैं। उनका चरित्र उस पवित्र तीर्थजल के समान है, जिसमें स्नान करने से मनुष्य पवित्र होता है। उसी प्रकार भरत जी के चरित्र का श्रवण करने से जीवन पावन हो जाता है।
मनुष्य को अपने भीतर के दोषों और दुर्गुणों का त्याग करना चाहिए। बाहरी शत्रु को कभी-कभी क्षमा किया जा सकता है, किंतु घर के भीतर प्रवेश कर चुके शत्रु को नहीं, क्योंकि वह भीतर ही भीतर पूरे परिवार को खोखला कर देता है: कथाव्यास आचार्य शांतनु जी महाराज
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