शुरू न्यूज़
दीक्षा ग्रहण कर पंचायती अखाड़ा श्री निरंजनी की परंपरा से जुड़े महंत कृष्णानंद गिरि*
*
बड़हलगंज:पंचायती अखाड़ा श्री निरंजनी, प्रयागराज में मंगलवार का दिन आध्यात्मिक एवं सनातन परंपरा की दृष्टि से विशेष महत्व का रहा। बड़हलगंज के लेटाघाट निवासी श्री श्री 1008 महंत कृष्णानंद गिरि जी महाराज ने महामंडलेश्वर डॉ. स्वामी रमण पुरी महाराज (एमबीबीएस, एमडी) के सानिध्य में दीक्षा ग्रहण कर स्वयं को पंचायती अखाड़ा श्री निरंजनी की सनातन परंपरा एवं संत परिवार को समर्पित किया। इस अवसर पर उन्होंने सनातन धर्म, संस्कृति और राष्ट्रहित के कार्यों को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।
महामंडलेश्वर डॉ. स्वामी रमण पुरी महाराज ने कहा कि सनातन धर्म की मूल शक्ति गुरु-शिष्य परंपरा में निहित है। गुरु से प्राप्त दीक्षा केवल धार्मिक संस्कार नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, त्याग, तपस्या, सेवा और लोककल्याण के मार्ग पर चलने का संकल्प है। उन्होंने कहा कि महंत कृष्णानंद गिरि का अखाड़े की आध्यात्मिक परंपरा से जुड़ना समूचे सनातन समाज के लिए हर्ष और गौरव का विषय है।
उन्होंने कहा कि संत समाज का दायित्व केवल व्यक्तिगत साधना तक सीमित नहीं, बल्कि समाज में धर्म, संस्कार, सेवा, सद्भाव और राष्ट्र चेतना का जागरण करना भी है। नई पीढ़ी को अपनी गौरवशाली आध्यात्मिक विरासत से जोड़ना समय की आवश्यकता है।
महंत कृष्णानंद गिरि महाराज ने कहा कि वे गुरुजनों के मार्गदर्शन में सनातन धर्म की सेवा, संत समाज की एकता, गौसेवा, पर्यावरण संरक्षण, शिक्षा, चिकित्सा एवं समाजहित के कार्यों को निरंतर आगे बढ़ाने का प्रयास करेंगे। उन्होंने अपने जीवन को धर्म, सेवा और लोककल्याण के लिए समर्पित करने का संकल्प दोहराया।
महामंडलेश्वर डॉ. स्वामी रमण पुरी महाराज ने बताया कि अखाड़े की परंपराओं एवं पूज्य गुरुजनों के आशीर्वाद के अनुसार आगामी कुंभ पर्व के पावन अवसर पर महंत कृष्णानंद गिरि जी महाराज को विधि-विधान के साथ संन्यास दीक्षा प्रदान कर उन्हें महामंडलेश्वर पद की दिशा में अग्रसर किया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह प्रक्रिया अखाड़े की परंपरा, वरिष्ठ संतों के मार्गदर्शन एवं निर्धारित धार्मिक विधि-विधान के अनुसार संपन्न होगी।कार्यक्रम के अंत में महामंडलेश्वर डॉ. स्वामी रमण पुरी महाराज ने संत समाज एवं समस्त सनातन धर्मावलंबियों से धर्म, संस्कृति और मानवता की सेवा के लिए एकजुट होने का आह्वान करते हुए कहा, “सनातन की सेवा ही मानवता की सेवा है और संतों का जीवन सदैव समाज के कल्याण के लिए समर्पित होता है।”
अपना राज्य चुनें
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह
बिहार
छत्तीसगढ़
दिल्ली
हरियाणा
हिमाचल प्रदेश
जम्मू और कश्मीर
झारखंड
मध्य प्रदेश
राजस्थान
उत्तर प्रदेश
उत्तराखंड