जो परजीवी आज आरक्षण और यूजीसी खत्म करने की बात कर रहे हैं उन्हें जाति के नाम पर दी जाने वाली यातनाओं के साथ साथ अश्पृश्यता असमानता छुआछूत भेदभाव और हेयदृष्टता पर विचार करना चाहिए। जब मानवता को बांटकर जाति धर्म वर्ण मजहब और संप्रदाय बनाया तभी ये सोचना चाहिए था कि संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप लोग पढ़ लिखकर जागरूक होंगे तब क्या होगा क्योंकि प्रतिभा किसी की मोहताज नहीं होती। बढ़ते शैक्षिक स्तर से जब विधान की बुनियाद डगमगाने लगी तो बौखलाहट चरम पर देखने को मिल रहा है और यही धरना प्रदर्शन जब निचला तपका करता था तो हंसी ठिठोली होती रही और बात जब खुद पर आई तो आंखें निकल जा रही है। अतः चिल्लाओ,खूब चिल्लाओ, गला फाड़कर चिल्लाओ लेकिन उर्जा बचाकर क्योंकि दिन प्रतिदिन और जोर जोर से चिल्लाना पड़ेगा, हमारी बराबरी जो करनी है अर्थात हम तो सदियों से चिल्लाते चले आ रहे हैं, अभी और बहुत मोदी आएंगे चिल्लवाने के लिए क्योंकि कंडीशन ही कुछ इस तरह से बनता जा रहा है।
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