*_जच्चा-बच्चा की मौत से निजी अस्पतालों की मनमानी तक, रीवा की स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे सवाल।_*
*_संजय गांधी, सुपर स्पेशियलिटी सहित शासकीय-निजी अस्पतालों की व्यवस्थाओं के खिलाफ राज्यपाल के नाम आयुक्त को ज्ञापन, एक सप्ताह में कार्रवाई नहीं तो शांतिपूर्ण सत्याग्रह की चेतावनी।_*
*_✍️उमेश पाठक_*
*_आज अभ तक न्यूज चैनल रीवा_*
रीवा की स्वास्थ्य व्यवस्था में पारदर्शिता, जवाबदेही और मरीजों के अधिकार को लेकर अब सवाल केवल अस्पतालों की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहे। संजय गांधी अस्पताल एवं सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल सहित जिले के शासकीय एवं निजी अस्पतालों में कथित अव्यवस्थाओं, चिकित्सकीय सेवाओं में लापरवाही, निजी प्रैक्टिस, उपचार एवं जांच शुल्क में पारदर्शिता की कमी तथा मरीजों से कथित अनधिकृत वसूली जैसे मुद्दों को लेकर नागरिकों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने प्रशासन के सामने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इन्हीं मुद्दों को लेकर 31 अगस्त 2026 को राज्यपाल के नाम संबोधित ज्ञापन आयुक्त, रीवा संभाग को सौंपा गया। ज्ञापन में स्वास्थ्य सेवाओं की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष समीक्षा कराने, शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई करने तथा दोष प्रमाणित होने पर संबंधित अधिकारियों, चिकित्सकों एवं कर्मचारियों के विरुद्ध नियमानुसार कठोर कार्रवाई किए जाने की मांग की गई।
ज्ञापन में संजय गांधी अस्पताल में प्रसूता कल्पना मिश्रा एवं उनके गर्भस्थ नवजात शिशु की मृत्यु के मामले को प्रमुखता से उठाया गया। परिजनों द्वारा लगाए गए चिकित्सकीय लापरवाही एवं अस्पताल स्टाफ के व्यवहार संबंधी आरोपों की निष्पक्ष जांच कराए जाने की मांग की गई है। ज्ञापनकर्ताओं का कहना है कि यदि जांच में चिकित्सकीय लापरवाही, कर्तव्य में गंभीर चूक अथवा अन्य दंडनीय कृत्य प्रमाणित होता है तो मामला केवल विभागीय निलंबन तक सीमित नहीं रहना चाहिए। दोष सिद्ध होने पर संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध कानून के अनुसार प्राथमिकी एवं अन्य वैधानिक कार्रवाई की जानी चाहिए। यहां प्रशासन के सामने मूल प्रश्न यही है कि क्या किसी गंभीर चिकित्सकीय घटना के बाद निलंबन और जांच समिति ही अंतिम जवाबदेही है, अथवा जांच के निष्कर्ष के आधार पर वास्तविक दायित्व भी तय होगा? ज्ञापन में ड्यूटी डॉक्टर, एनेस्थीसिया विभाग तथा संबंधित स्टाफ की भूमिका की अभिलेखीय एवं चिकित्सकीय जांच कराने की मांग की गई है।
किसी भी चिकित्सकीय मृत्यु के मामले में भावनात्मक आरोपों और प्रशासनिक निष्कर्षों के बीच सबसे महत्वपूर्ण कड़ी मेडिकल रिकॉर्ड और वैज्ञानिक जांच होती है। इसलिए मांग उठाई गई है कि संबंधित मामले में केस शीट, उपचार रिकॉर्ड, ड्यूटी रोस्टर, चिकित्सकीय प्रोटोकॉल, जांच रिपोर्ट, दवाओं का रिकॉर्ड, ऑक्सीजन एवं अन्य आपातकालीन संसाधनों की उपलब्धता, एनेस्थीसिया संबंधी दस्तावेज तथा उपलब्ध CCTV फुटेज का परीक्षण कराया जाए। सवाल यह भी है कि मरीज के अस्पताल पहुंचने से लेकर मृत्यु तक प्रत्येक चरण में किस चिकित्सक एवं कर्मचारी की क्या भूमिका थी? मरीज की स्थिति बिगड़ने पर वरिष्ठ चिकित्सक को कब सूचित किया गया? आवश्यक चिकित्सा सुविधा उपलब्ध थी अथवा नहीं? इन प्रश्नों का उत्तर अभिलेखों से निकलना चाहिए, अनुमान से नहीं।
ज्ञापन में सरकारी चिकित्सकों द्वारा निजी प्रैक्टिस किए जाने की शिकायतों को भी गंभीरता से उठाया गया है। यदि कोई सरकारी चिकित्सक सेवा नियमों के विपरीत निजी प्रैक्टिस करता है अथवा शासकीय ड्यूटी प्रभावित होती है, तो इसकी जांच केवल शिकायत प्राप्त होने तक सीमित न रहकर ड्यूटी रोस्टर, बायोमेट्रिक उपस्थिति, OPD रिकॉर्ड, निजी क्लीनिक/नर्सिंग होम की गतिविधियों और संबंधित सेवा नियमों के आधार पर की जानी चाहिए। ज्ञापनकर्ताओं ने मांग की है कि शासकीय चिकित्सकों की ड्यूटी के दौरान निजी चिकित्सा गतिविधियों पर प्रभावी निगरानी व्यवस्था बनाई जाए तथा नियमों का उल्लंघन प्रमाणित होने पर नियमानुसार कार्रवाई हो।
रीवा की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर एक बड़ा सवाल यह भी उठाया गया है कि बड़े शासकीय अस्पतालों में वरिष्ठ चिकित्सकों की वास्तविक OPD एवं वार्ड ड्यूटी की स्थिति क्या है। यदि किसी विभाग में वरिष्ठ चिकित्सक निर्धारित ड्यूटी के दौरान उपलब्ध नहीं हैं और मरीजों की जांच, उपचार अथवा ऑपरेशन का दायित्व मुख्यतः जूनियर डॉक्टरों अथवा प्रशिक्षणरत PG चिकित्सकों पर रहता है, तो यह व्यवस्था किस सीमा तक स्वीकृत प्रोटोकॉल के अनुरूप है, इसका प्रशासनिक एवं चिकित्सकीय ऑडिट होना चाहिए। मुद्दा जूनियर डॉक्टरों की क्षमता पर प्रश्न उठाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि जिस स्तर की विशेषज्ञ चिकित्सा सेवा के नाम पर मरीज शासकीय मेडिकल संस्थान पहुंचता है, वह सेवा निर्धारित मानकों के अनुसार वास्तव में उपलब्ध भी हो।
निजी अस्पतालों में विभिन्न जांचों, प्रक्रियाओं, उपचार एवं अन्य सेवाओं की दरों को लेकर पारदर्शिता की मांग भी ज्ञापन में शामिल है। मांग की गई है कि जहां नियमों के तहत आवश्यक हो, वहां जांच एवं उपचार से संबंधित निर्धारित शुल्क, पैकेज, प्रक्रियात्मक शुल्क और अन्य देय राशि अस्पताल के सूचना पटल तथा उपलब्ध होने पर जिला प्रशासन की वेबसाइट पर सार्वजनिक की जाए, ताकि मरीज एवं परिजन उपचार शुरू होने से पहले संभावित खर्च की जानकारी प्राप्त कर सकें। यह व्यवस्था मरीज को केवल जानकारी नहीं देती, बल्कि अस्पताल और मरीज के बीच वित्तीय पारदर्शिता भी सुनिश्चित करती है।
ज्ञापन में शासकीय एवं निजी अस्पतालों के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में CCTV व्यवस्था को प्रभावी बनाने तथा फुटेज को निर्धारित अवधि तक सुरक्षित रखने की मांग की गई है। अस्पताल में प्रवेश-निकास, आपातकालीन क्षेत्र, पंजीयन, दवा वितरण, महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्थानों और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में उपलब्ध CCTV रिकॉर्ड गंभीर शिकायतों की जांच में महत्वपूर्ण साक्ष्य बन सकते हैं। लेकिन केवल कैमरे लगाना पर्याप्त नहीं, कैमरे चालू हैं या नहीं, फुटेज सुरक्षित है या नहीं और आवश्यकता पड़ने पर जांच एजेंसी को उपलब्ध कराया जाता है या नहीं, इसकी भी जवाबदेही निर्धारित होनी चाहिए।
ज्ञापन में अस्पतालों में कथित रूप से एक्सपायरी दवाओं के उपयोग, लिफ्ट एवं वेंटिलेटर जैसी महत्वपूर्ण चिकित्सा/तकनीकी व्यवस्थाओं की सुरक्षा तथा स्ट्रेचर एवं अन्य सेवाओं के नाम पर कथित अनधिकृत वसूली जैसे मुद्दों पर भी प्रशासनिक निगरानी की मांग की गई है। इन शिकायतों की सत्यता निर्धारित करने के लिए केवल मौखिक जांच पर्याप्त नहीं होगी। इसके लिए दवा स्टॉक रजिस्टर, Batch Number एवं Expiry Date, Drug Issue Register, लिफ्ट के मेंटेनेंस रिकॉर्ड, वैधानिक सुरक्षा/निरीक्षण प्रमाण-पत्र, वेंटिलेटर का Preventive Maintenance Record, उपकरणों का लॉगबुक, स्ट्रेचर/अन्य सेवाओं से संबंधित शुल्क व्यवस्था, CCTV फुटेज, मरीज एवं परिजनों के बयान का अभिलेखीय परीक्षण आवश्यक होगा।
ज्ञापन का एक महत्वपूर्ण पहलू निजी अस्पतालों की जवाबदेही से जुड़ा है। निजी अस्पतालों में मरीजों से संबंधित शिकायतों, शुल्क, चिकित्सकीय सेवाओं, सुरक्षा मानकों और अन्य नियामकीय शर्तों की जांच सक्षम विभाग एवं लागू कानून/नियमों के अनुसार की जानी चाहिए। निजी अस्पताल चिकित्सा सेवा प्रदान करने वाले संस्थान हैं, लेकिन मरीज के अधिकार, सूचित सहमति, शुल्क की पारदर्शिता, रिकॉर्ड उपलब्धता और निर्धारित सुरक्षा मानकों का पालन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। कल्पना मिश्रा की मृत्यु के मामले में पीड़ित परिवार को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने की मांग भी ज्ञापन में की गई है। लेकिन आर्थिक सहायता अथवा मुआवजा और उत्तरदायित्व निर्धारण को एक-दूसरे का विकल्प नहीं बनाया जा सकता। यदि जांच में लापरवाही प्रमाणित होती है तो मुआवजा पीड़ित परिवार के लिए राहत का माध्यम हो सकता है, लेकिन वह जवाबदेही का विकल्प नहीं है। इसी तरह यदि जांच में आरोप प्रमाणित नहीं होते हैं तो संबंधित चिकित्सक एवं कर्मचारियों को भी निष्पक्ष प्रक्रिया के तहत दोषमुक्त किया जाना चाहिए।
ज्ञापनकर्ताओं ने प्रशासन को एक सप्ताह की समयसीमा देते हुए चेतावनी दी है कि यदि उठाई गई मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं की गई तो रीवा जिले के नागरिक एवं समाजसेवी शांतिपूर्ण सत्याग्रह/आंदोलन के लिए बाध्य होंगे। यह चेतावनी प्रशासन के लिए केवल आंदोलन का संकेत नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं में बढ़ती जन-असंतुष्टि को गंभीरता से लेने का अवसर भी है। अब देखना यह होगा कि ज्ञापन कार्यालयीन पत्राचार की फाइल में दर्ज होकर रह जाता है या प्रशासन इसके आधार पर समयबद्ध जांच, तथ्यात्मक सत्यापन और उत्तरदायित्व निर्धारण की दिशा में वास्तविक कदम उठाता है।
संजय गांधी और सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल जैसे बड़े चिकित्सा संस्थानों से जनता केवल भवन, मशीनें और डॉक्टरों की सूची नहीं मांगती। जनता चाहती है कि संकट की घड़ी में डॉक्टर उपलब्ध हों, उपचार समय पर मिले, दवाएं गुणवत्तापूर्ण हों, उपकरण सुरक्षित हों, शुल्क पारदर्शी हों और शिकायत होने पर निष्पक्ष जांच हो। कल्पना मिश्रा की मौत का अंतिम सच जांच से सामने आना चाहिए। यदि किसी स्तर पर चिकित्सकीय लापरवाही प्रमाणित होती है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और यदि आरोप तथ्यहीन हैं तो संबंधितों को भी स्पष्ट रूप से दोषमुक्त किया जाना चाहिए। क्योंकि प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता कार्रवाई की घोषणा से नहीं, कार्रवाई के निष्पक्ष परिणाम से बनती है।
रीवा में अब सवाल सिर्फ एक अस्पताल का नहीं है, सवाल यह है कि क्या सरकारी और निजी स्वास्थ्य संस्थानों में मरीज सर्वोच्च प्राथमिकता है, या व्यवस्था अपनी सुविधा के अनुसार चलती रहेगी? एक सप्ताह की समयसीमा अब प्रशासन के सामने है। जनता की नजर इस बात पर होगी कि इस ज्ञापन के बाद फाइल चलेगी, जांच चलेगी या फिर वही पुरानी व्यवस्था चलेगी।
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