*देश में जो चल रहा है, उसे अप्रत्याशित बदलाव का इशारा समझिए!*
टीम मोदी को समझना इतना आसान नहीं। जब समस्त पावर उन्हीं के हाथ में है, तो क्या मजाल जो उनकी मर्जी के बिना एक पत्ता भी हिले। पहले फिल्मों में होता था – बड़ा लीडर खुद घर फुंकवाता था और सुबह राहत सामग्री लेकर पहुंच जाता था, इस बदलते दौर में तरीका थोड़ा चेंज हो चुका है। ऐसे में क्या कार्यपालिका और क्या न्यायपालिका।
बहुतायत आबादी की मंशा को भांप कर एक बड़ा राजनैतिक यू-टर्न होने वाला है, जो फिर एक बार विपक्ष को गच्चा दे देगा। जिन नाराज वोटरों को रिझाने के लिए PDA की परिभाषा तक सस्पेंस कर दी गई, वहीं आगे चलकर उनके पतन का कारण भी बन जाएंगे, क्योंकि 90% आबादी उन्हीं को टारगेट कर रही है और रिएक्शन में वोट करेगी।
देश की सियासत से यदि अत्याचारी, धनबली, प्रभावशालियों का सफाया होता है तो यह व्यवस्था परिवर्तन की शुरुआत है क्योंकि गांव से लेकर शहर तक और सड़क से लेकर सदन तक दबदबा इन्हीं का रहता है,गरीब कमजोर आम जनमानस तो बड़े मुश्किल से पारिवारिक भरण पोषण कर पाता है उसे शतरंज का खिलाड़ी बनने में क्या ही इंटरेस्ट……
*UGC, जाति जनगणना, और आरक्षण आदि को लेकर 90% आवादी के साथ खासतौर पर वंचित अतिपिछड़े उपेक्षित वर्गों पर मचा सियासी घमासान कोई संयोग नहीं, बल्कि नये पैंतरे का सफल प्रयोग साबित हो सकता है।* जैसा कि केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले जी ने भी साफ कहा है –
*”आरक्षण खत्म करने की मांग करने वाले राष्ट्र द्रोही”*
बहरहाल, यह देखने वाली दिलचस्प बात होगी कि आगे-आगे होता क्या है। बशर्ते हमें सामूहिक विकास की धारणा से जनहित में निचले पायदान के जीवन स्तर को उठाने के लिए निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए, क्योंकि रात के बाद ही दिन की शुरुआत होती है। अतः आरक्षण सुधार से पहले वंचितों को संख्यात्मक हिस्सेदारी तय करते हुए शैक्षणिक सुधार अत्यंत आवश्यक है क्योंकि उन अत्याचारी धनबली प्रभावशालियों द्वारा शिक्षा को व्यवसाय बनाते हुए पहले ही सिस्टम हैक कर लिया गया है ताकि गरीब कमजोर प्रतिभाएं पढ़ लिखकर आगे न बढ़ने पाएं और मुखर समाजसेवियों की आवाज दबा दी जाएं इस नाते व्यवस्था परिवर्तन जरूरी है।🙏
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