गोरखपुर में बखिरा झील से चौरमा नाला होते हुए राप्ती नदी में पानी बह जाने से किसानों की चिंता बढ़ गई है।
गोरखपुर में बखिरा झील से चौरमा नाला होते हुए राप्ती नदी में पानी बह जाने से किसानों की चिंता बढ़ गई है। इस झील से चलने वाली पंप नहरों से हजारों एकड़ खेतों की सिंचाई होती है। किसानों का सवाल है कि अगर बरसात के बाद झील का पानी लगातार राप्ती नदी में चला जाएगा, तो आने वाले समय में खेतों की सिंचाई कैसे होगी?
इसी समस्या को लेकर नेवास निवासी उमाशंकर तिवारी ने जल संसाधन मंत्री स्वतंत्र देव सिंह से मुलाकात की। उन्होंने चौरमा नाले पर पानी रोकने की व्यवस्था करने की मांग की। तिवारी ने मंत्री को किसानों की समस्या बताते हुए कहा कि बखिरा झील के पानी को बचाए बिना पंप नहरों से किसानों को पर्याप्त सिंचाई सुविधा देना मुश्किल होगा।
उमाशंकर तिवारी ने बताया कि बखिरा झील से पंप नहर प्रथम और पंप नहर द्वितीय चलती हैं। ये नहरें करीब 1956 में बनी थीं। दोनों पंप नहरों से क्षेत्र के लगभग 1000 हेक्टेयर खेतों की सिंचाई होती है और कई किसान इन नहरों पर निर्भर हैं। किसानों के लिए ये नहरें सिंचाई का जरूरी साधन हैं।
उन्होंने कहा कि बरसात के मौसम में झील में पर्याप्त पानी जमा हो जाता है। लेकिन बरसात खत्म होने के बाद झील का पानी चौरमा नाले के रास्ते राप्ती नदी की ओर बह जाता है। इससे झील में पानी का स्तर तेजी से कम होने लगता है और बाद में पंप नहरों को चलाने में परेशानी होती है। इसका सीधा असर किसानों की फसलों पर होता है।
उमाशंकर तिवारी ने जल संसाधन मंत्री से मांग की कि बखिरा झील से चौरमा नाला होते हुए राप्ती नदी को जोड़ने वाले नाले पर फाटक या कोई और पानी रोकने का इंतजाम किया जाए। इससे बरसात के बाद झील का पानी बेवजह राप्ती नदी में जाने से रोका जा सकेगा और जरूरत के अनुसार पानी को बचाकर रखा जा सकेगा।
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