सवर्ण जातियों के कुछ लोग जंतर-मंतर पर आरक्षण एवं यूजीसी अधिनियम 2026 समाप्त करने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। आंदोलन करना उनका अधिकार है, क्योंकि लोकतंत्र में अपनी मांगों के लिए शांतिपूर्ण ढंग से आंदोलन करने का अधिकार सभी नागरिकों को है।
लेकिन एक दिलचस्प विरोधाभास यह है कि इनमें से कई लोग दिन-रात संविधान की आलोचना करते हैं, जबकि अपने आंदोलन के अधिकार और अपनी मांगों को रखने के लिए उसी संविधान द्वारा दिए गए लोकतांत्रिक अधिकारों की दुहाई दे रहे हैं। कल वे यही कह रहे थे कि “हमें आंदोलन करने और अपनी मांग रखने का अधिकार देश के संविधान ने दिया है” सवाल केवल इतना है कि यदि संविधान इन अधिकारों का स्रोत है, तो उसकी आलोचना करते समय भी उसके मूल लोकतांत्रिक मूल्यों को समझना और सम्मान हमेशा करना चाहिए।
इन आंदोलनों में रखी जाने वाली कुछ मांगें पूर्वाग्रह से भरी हैं। उदाहरण के लिए, यह मांग कि आरक्षण केवल आर्थिक आधार पर होना चाहिए तथा बात यदि यूजीसी पर ही कर लें तो मोदी सरकार यैसे ही शैक्षणिक क्षेत्र में भेदभाव को लेकर शख्त नियम नहीं बना दी बल्कि रोहित बेमुला केस में न्यायालय की टिप्पणी तथा ग्राम पुतसर थाना महुली जनपद संतकबीरनगर उत्तर प्रदेश में यूपीएससी की तैयारी कर रहे छात्र छात्राओं पर जानलेवा हमला आदि तमाम भ्रांतियों को देखते हुए उक्त निर्णय हुआ है।
भारतीय समाज में ऐतिहासिक वंचना और सामाजिक अश्पृश्यता/असमानता का आधार केवल आर्थिक नहीं रहा है।
जाति-आधारित बहिष्करण, सामाजिक स्थिति और शैक्षणिक पिछड़ापन इसके महत्वपूर्ण आधार रहे हैं। इसलिए आरक्षण को केवल आर्थिक गरीबी के आधार पर समझना उसके ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ को नजरअंदाज करना है।
हालाँकि, मौजूदा आरक्षण व्यवस्था में सुधार की मांग को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। वास्तव में, इस पर गंभीर और तथ्य-आधारित बहस होनी चाहिए। उदाहरण के लिए, OBC श्रेणी के भीतर अनेक जातियाँ लंबे समय से यह सवाल उठा रही हैं कि आरक्षण का लाभ कुछ अपेक्षाकृत प्रभावशाली जातियों तक अधिक क्यों सीमित है और अत्यंत पिछड़ी जातियों तक उसका लाभ अपेक्षित स्तर पर क्यों नहीं पहुँच रहा है। अनुसूचित वर्गों के समान संवैधानिक लाभों के वितरण की मांग सामने आती रही है खासतौर पर अतिपिछड़ा एकीकरण महाअभियान के द्वारा जिसका नेतृत्व श्री अनिल कुमार प्रजापति जी कर रहे हैं।
इसलिए बहस ‘आरक्षण बनाम आरक्षण-विरोध’ तक सीमित नहीं होनी चाहिए। असली सवाल यह होना चाहिए कि आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था कितनी प्रभावी है, उसका लाभ किन सामाजिक समूहों तक पहुँच रहा है, कौन-से समूह अब भी प्रतिनिधित्व से वंचित हैं और अत्यंत पिछड़े समूहों तक अवसरों का अधिक न्यायपूर्ण वितरण कैसे सुनिश्चित किया जा सकता है।
राजनीतिक आरक्षण के प्रश्न पर भी संवैधानिक प्रावधानों और संविधान सभा की बहसों के संदर्भ में गंभीर विमर्श आवश्यक है। क्योंकि पिछले कुछ सालों से देखा जा रहा है कुछ गिने चुने परिवारों से ही लोग राजनीति में आ रहे हैं। एक तरह से वंचित तबकों को पोलिटिकल प्रिजनर बनाया जा रहा है।
एक निष्पक्ष शोधार्थी की कलम से…….
इसलिए आरक्षण पर बहस होनी चाहिए। लेकिन इतिहास, समाजशास्त्र और संवैधानिक व्यवस्था को समझकर। केवल पूर्वाग्रह और राजनीतिक नारों के आधार पर नहीं।
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