विरोध का स्वर अब विकराल हो गया है। ये सरकार विरोध नहीं, व्यवस्था परिवर्तन का आगाज है!
आजादी के बाद सत्ता में बैठे सक्षम लोगों ने अपनी सुविधा के लिए एक विधान बना दिया।अशिक्षा का फायदा उठाकर “फूट डालो राज करो” की सामंतवादी नीति को पुश्तैनी परंपरा बना दिया।
लेकिन अब खेल खत्म।
जैसे-जैसे शिक्षा और जनजागरूकता बढ़ी,
लोगों ने विज्ञान और संविधान का अनुश्रवण करना शुरू किया।
विडंबनाओं के खिलाफ आवाज उठने लगी।
ये बात अत्याचारी, धनबली और प्रभावशालियों के गले नहीं उतर रही।
टीम मोदी अब यू-टर्न लेना चाहती है, पर सवर्ण समाज में विरोधाभासी स्वर उठना लाजमी है।फिर भी बीजेपी के साथ रहना उनकी मजबूरी है। केंद्र ये जानता है।
विपक्ष और ज्यादा फेल है।
वो खुद मोदी के बनाए जाल में फंस रहा है। जिन वोटों से निचले पायदान के लोगों को घृणा है,
उसी वोट बैंक के लिए मारामारी कर रहा है।
जनता अब सब समझ चुकी है।
पुतसर से उठी “समान शिक्षा + अतिपिछड़ा आरक्षण + जाति जनगणना 2027” की मांग
अब राष्ट्रीय आंदोलन बन गई है।
निचोड़: बदलाव होकर रहेगा।
क्योंकि अब जनता शिक्षित है, जागरूक है।
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