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उत्तर प्रदेश की राजनीति में आगामी चुनावों और उपचुनावों के बीच क्षेत्रीय दलों पर विधानसभा टिकटों की बिक्री और करोड़ों रुपये में रेट तय होने के गंभीर आरोपों ने सियासी पारा बढ़ा दिया है। मीडिया खुलासों (स्टिंग ऑपरेशन) और बगावती कार्यकर्ताओं के दावों के बाद सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा), निषाद पार्टी और अपना दल (एस) विपक्ष और जनता के निशाने पर आ गए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स और असंतुष्ट दावेदारों के मुताबिक, सुभासपा (ओम प्रकाश राजभर) के पदाधिकारियों और मध्यस्थों पर एक विधानसभा सीट के लिए 5 से 12 करोड़ रुपये तक की फंडिंग या रकम तय करने के आरोप लगे हैं, जिससे पार्टी के सालों पुराने निष्ठावान कार्यकर्ताओं को दरकिनार करने की बात सामने आई है।
वहीं, मजवां विधानसभा उपचुनाव के दौरान निषाद पार्टी (डॉ. संजय निषाद) के नेतृत्व पर भी पैसे लेने के गंभीर आरोप लगे। बगावती नेताओं और स्टिंग खुलासों का दावा है कि आवेदन और बैठकों के नाम पर ₹5 लाख से ₹10 लाख तक नकद वसूले गए, जबकि सीटों की मांग के आधार पर ₹2 करोड़ से ₹5 करोड़ तक के आंकड़े सामने आए हैं। स्थानीय नेताओं का आरोप है कि दिल्ली और लखनऊ में बैठकों के नाम पर लाखों रुपये खर्च कराने के बावजूद अंतिम समय में टिकट नहीं दिया गया। इसके अलावा, एनडीए गठबंधन की सहयोगी अपना दल (एस) (अनुप्रिया पटेल) पर भी दावेदारों से सांगठनिक फंड और ‘सहयोग राशि’ के नाम पर मोटी रकम मांगने के आरोप उछले हैं।
इन आरोपों पर निषाद पार्टी के अध्यक्ष डॉ. संजय निषाद ने सफाई देते हुए इसे बदनाम करने की राजनीतिक साजिश बताया और कहा कि टिकट न मिलने पर ‘अंगूर खट्टे’ लगने लगते हैं; यदि किसी के पास लेनदेन का ठोस प्रमाण है तो सामने लाए। वहीं सुभासपा नेतृत्व का कहना है कि पार्टी कैडर के आधार पर प्रत्याशी चुनती है और विपक्षी दल उनकी बढ़ती लोकप्रियता से बौखलाकर अनर्गल आरोप लगा रहे हैं। इस पूरे मामले से जमीन पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं में भारी असंतोष पनप रहा है और चुनावी शुचिता पर सवाल खड़े हो गए हैं, जिसके चलते विपक्षी पार्टियों ने चुनाव आयोग से मामले की पारदर्शी जांच और कड़ी कार्रवाई की मांग की है।
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