देश में ईमानदारी का कोई मूल्य नहीं रह गया है और संवैधानिक अधिकारों, सामाजिक न्याय से लेकर वोट तक सब कुछ बिकाऊ हो चुका है। देश की वर्तमान परिस्थितियों पर गहरा आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा गया है कि आज धनबली अत्याचारियों के आगे ईमानदारी घुटने टेकने पर मजबूर है। अदालती हस्तक्षेप के बावजूद प्रधान, जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लॉक प्रमुख जैसे महत्वपूर्ण पदों पर प्रशासकों को बैठाया जा रहा है, जिससे यह गंभीर आशंका पैदा होती है कि कल को विधायकों और मुख्यमंत्रियों का कार्यकाल भी इसी तरह बढ़ाया जा सकता है।
एक तरफ साल 2029 तक “एक देश एक चुनाव” कराने की पुरजोर चर्चा हो रही है, लेकिन दूसरी तरफ “एक देश एक किताब और समान शिक्षा” के मुद्दे पर पूरी तरह चुप्पी साधी गई है। जबकि देश के असली और बुनियादी मुद्दे भय, भूख, भ्रष्टाचार, भेदभाव, महंगाई और बेरोजगारी हैं, जिन पर सबसे पहले अंकुश लगाना बेहद जरूरी है। आज यह गंभीर सवाल उठ रहा है कि क्या लोकतंत्र केवल चुनाव तक ही सीमित रह गया है और क्या हमारा संविधान सिर्फ सरकारी फाइलों में दफन होकर रह गया है।
इन हालातों के खिलाफ अब अंधविश्वास और पाखंड को छोड़कर संविधान को साक्षी मानकर सीधे लड़ाई लड़ने का समय आ गया है, क्योंकि समाज के एकीकरण के बिना कुछ भी बदलना संभव नहीं है। इस संघर्ष में सोनम वांगचुक का पूर्ण समर्थन करते हुए स्पष्ट किया गया है कि ईमानदारी बिकाऊ नहीं होती बल्कि इसे संघर्ष से जीता जाता है। जब पूरी व्यवस्था ही बिक जाए, तो जनता को जागना ही पड़ता है, इसलिए संविधान की रक्षा के लिए लगातार आवाज उठाने और एकजुट रहने की अपील की गई है।
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