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सुलतानपुर की शाहगंज पुलिस चौकी में हुई एक घटना ने खाकी के इकबाल को तार-तार कर दिया है, जिसे लोकतंत्र में न्याय की पहली दहलीज माना जाता है। वायरल हुए एक वीडियो में भाजपा नेत्री पूजा कसौधन खुलेआम एक युवक को थप्पड़ मारती और “औकात भूल जाओगे” जैसी धमकी देती दिख रही हैं, जिसे सत्ता के उन्माद का चरम बताया गया है। इस घटना का सबसे भयावह पहलू यह है कि वर्दीधारी पुलिसकर्मी मूकदर्शक बने तमाशा देखते रहे, जिससे उनकी वर्दी के मान पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
संपादकीय में सवाल उठाया गया है कि क्या कानून सबके लिए बराबर है या खादी वालों के लिए अलग ‘कोड’ है। यह इंगित किया गया है कि यदि यह कृत्य किसी आम नागरिक द्वारा किया गया होता, तो उस पर अब तक संगीन धाराओं में मुकदमा दर्ज हो चुका होता। यह भी प्रश्न किया गया है कि क्या सत्ताधारी दल से जुड़ा होना कानून के उल्लंघन का लाइसेंस बन गया है। पुलिस की भूमिका केवल तमाशबीन की क्यों रही, और यदि चौकी के अंदर ही कानून हाथ में लिया जा रहा है, तो बाहर आम जनता की सुरक्षा कौन सुनिश्चित करेगा। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि या तो स्थानीय पुलिस का मनोबल पूरी तरह टूट चुका है या वह सत्ता के दबाव में पंगु हो चुकी है।
नेत्री के धमकी देने के साहस पर भी सवाल खड़े किए गए हैं, जो यह संकेत देता है कि उन्हें प्रशासनिक तंत्र का तनिक भी भय नहीं है। बताया गया है कि यह नेत्री पहली बार विवादों के केंद्र में नहीं हैं, लेकिन इस बार मामला सीधे पुलिस की साख से जुड़ा है। पुलिस विभाग के आला अधिकारियों को इस पर गंभीरता से विचार करना होगा कि क्या वे ‘खाकी’ की गरिमा को वापस ला पाएंगे, या पुलिस चौकी भविष्य में केवल राजनीतिक अखाड़ों का केंद्र बनकर रह जाएगी। सुलतानपुर की जनता प्रशासन की ‘निष्पक्षता’ पर नजर रख रही है और चेतावनी दी गई है कि यदि इस घटना पर कड़ी कार्रवाई नहीं हुई, तो आम आदमी का व्यवस्था से भरोसा उठना तय है।
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