*संपत्ति बंटते ही रिश्ते हुए बेगाने! सैफई में बुजुर्ग की मौत के बाद अपनों ने नहीं दी अंतिम विदाई, रक्तदाता समूह ने निभाया फर्ज*
पैसे की पहचान यहां इन्सान की कीमत कोई नहीं बच के निकल जा इस बस्ती से करता मुहब्बत कोई नहीं,यह कहावत उस समय शर्मशार हुईं जहां फिल्म “अवतार” की तरह रिश्तों को शर्मशार करने वाली सच्ची दर्दनाक कहानी सैफई मेडिकल यूनिवर्सिटी में अस्पताल में कई दिनों से भर्ती जनपद एटा के एक कारोबारी राजकुमार सक्सेना उम्र 70 वर्ष को उसके संगे परिवारिक जनों ने नहीं दी अन्तिम विदाई। वहां मौजूद स्टाफ कर्मियों ने जब उनके बड़े बेटे से मोबाइल से सम्पर्क किया तो उसने बोला पिता से नहीं है कोई रिश्ता शव जलायें, बहायें या दफनाएं उन्हें कोई नहीं मतलब। यह घटना को देखकर वहां मौजूद सभी लोग स्तब्ध रह गये। जबकि मृतक के तीन बेटे एक बेटी व पत्नी थी। जो अपने बेटों के कहने पर नहीं हुई अन्तिम संस्कार में शामिल। इसकी सूचना रक्तदाता समूह के प्रमुख शरद तिवारी को हुई तो वह अपनी टीम के साथ सैफई अस्पताल आयें और उनके शव को एम्बुलेंस से इटावा यमुना घाट पर लाकर विधि-विधान से अंत्येष्ठि पर रखकर उनका अंतिम संस्कार किया गया। जबकि उनके पास काफी प्रापर्टी थी जो बेटों ने अपने नाम करा ली थी। मरते समय उनके पास कुछ नहीं था। इसलिए परिवार के सदस्यों ने मानवता को शर्मशार करते हुए उनका अंतिम संस्कार तक नहीं किया। यह घटना आने वाली पीढ़ियों से मां-बाप को सबक है कि पैसा है तो परिवार है वर्ना कुछ नहीं। एक बाप जीवन भर संघर्ष करते हुए अपने बच्चों की शिक्षा व परिवरिस में पूरा बोझ भार उठाता है। जब बच्चें काबिल हो जातें हैं तो वहीं बच्चें बूढ़े मां-बाप की सेवा करने के बजाय कन्नी काटने लगते हैं। जमाना बदल गया, कि आज के बच्चों में मां-बाप के लिए संस्कार व सम्मान नहीं है।
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