अद्भुत दिन रहा… ❤️
आज का दिन मेरे जीवन का एक
आज मुझे पहली बार एहसास हुआ कि मैंने अपने जीवन में आखिर क्या कमाया है।
सुबह बोक्टा गया। मल मोबाइल सेंटर पर शिवाजी मल जी मिले। पहले तो उन्होंने मेरा मोबाइल ठीक किया और फिर 100 रुपये का नाश्ता भी कराया। उन्होंने कहा—“भाई, आप बहुत दिन बाद आए हैं।”
करीब 15 साल पहले, जब मल भाई की मोबाइल की दुकान खुल रही थी, तब मैंने उन्हें मोबाइल की दुकान खोलने का विचार दिया था और अपनी तरफ से छोटा सा सहयोग किया था। आज इतने वर्षों बाद उनका इतना अपनापन देखकर मन भर आया।
वहां से गोरखनाथ गया। एक दुकान पर चप्पल पसंद की, दुकानदार 1400 रुपये मांग रहा था और मैं मोलभाव कर ही रहा था। तभी वहां प्याज बेचने वाला एक भाई आया। पिछले साल मैंने उससे प्याज लिया था और गलती से बिना पैसे दिए चला गया था। अगले दिन मुझे याद आया तो 100 रुपये का तेल डलवाकर उसके पैसे देने वापस गया था।
आज वह मुझे देखते ही दुकानदार से बोला—
“भैया, मैं इन्हें जानता हूं। ये बहुत अच्छे और ईमानदार आदमी हैं, इन्हें 850 रुपये में दे दीजिए।”
चप्पल लेने के बाद मैंने उसे चाय पीने के लिए बुलाया। हम दोनों ने चाय और पकौड़े खाए। मैं पैसे देने लगा तो चाय वाले ने कहा—
“भैया, आप मुझे पहचान नहीं रहे? मैं संतोष हूं। आपने मुझे बजाज की गाड़ी दी थी, मेरे 9000 रुपये आज भी बाकी हैं।”
मुझे याद आया। करीब 5 साल पहले उसका ऑटो का एक किस्त का पैसा भी मैंने अपनी तरफ से भर दिया था। बाद में मेरा ऑटो वाला काम बंद हो गया और बात वहीं रह गई।
संतोष ने बताया कि उसका एक्सीडेंट हो गया था, पैर खराब हो गया और किस्त न भर पाने के कारण गाड़ी भी चली गई।
आज वह मुझे 1000 रुपये देने लगा। मैंने कहा—
“भाई, ये पैसे तुम अपने पास रखो। तुम्हारे 9000 रुपये मैं पहले ही भूल चुका हूं।”
चाय-पकौड़े के 100 रुपये देने लगा तो उसने भी पैसे नहीं लिए। उसकी मां, पत्नी और बेटा भी आकर ऐसे मिले जैसे मैं उनका अपना बड़ा भाई हूं। उन्होंने कहा—
“भैया, आज रुक जाइए, कल जाइएगा।”
मैंने उनसे फिर कभी आने का वादा किया और वहां से निकल गया।
रात करीब 8 बजे तेनुआं टोल प्लाजा पहुंचा। गांव के अपने मित्र विनय जी को फोन किया और कहा—“भाई, समय हो गया है, घर चलते हैं।”
फिर मैंने कहा—
“बहुत दिन हो गए होटल में खाना नहीं खाया, आज होटल में खाना खाते हैं।”
हम दोनों होटल पहुंचे, खाना खाया और जब भुगतान करने मालिक के पास गया तो उन्होंने मुझे देखते ही पहचान लिया।
बोले—
“भैया, आप एक साल बाद आए हैं। पिछले साल तो आप हर दो दिन में आते थे, कभी-कभी दिन में दो बार भी।”
मैंने बताया कि मैं बाहर था, इसलिए गोरखपुर में नहीं था।
उन्होंने कहा—
“भैया, आज मैं आपसे पैसे नहीं लूंगा।”
मैंने बहुत कोशिश की और पूछा—“क्यों?”
उन्होंने कहा—
“याद है, पिछले साल आपसे गोरखनाथ में मुलाकात हुई थी। आपने मुझे नाश्ता कराया था और जब मैं पैसे देने लगा तो आपने पैसे नहीं लिए थे। आज आप मेरे होटल में आए हैं, तो आज का बिल मेरी तरफ से।”
मैंने बहुत ज़िद की, लेकिन उन्होंने पैसे नहीं लिए।
आज की इन सारी घटनाओं ने मुझे अंदर से बहुत हिम्मत दी।
मैंने जीवन में पैसा तो कमाया, लेकिन शायद उतना बचा नहीं पाया।
लेकिन आज समझ आया कि मेरी असली कमाई बैंक बैलेंस या जेब में रखा पैसा नहीं है।
मेरी असली कमाई है—
❤️ लोगों का विश्वास
❤️ लोगों का सम्मान
❤️ जरूरत के समय किसी के काम आ जाना
❤️ और वर्षों बाद भी लोगों का मुझे अपनेपन से याद करना।
पैसा कमाना बड़ी बात नहीं है,
किसी के दिल में अपनी जगह बना लेना ही जीवन की सबसे बड़ी कमाई है।
आज मैं खुद को बहुत अमीर महसूस कर रहा हूं। 🙏❤️
आप लोग बताइए—इन घटनाओं को आप किस नजर से देखते हैं?
आपकी राय मेरे लिए बहुत मायने रखती है।
कमेंट करके जरूर बताइए।
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