*17 अति पिछड़ी जातियों के सम्मानित विशेषज्ञों, रचनाकारों, न्यायविदों, विभिन्न सेवाओं में कार्यरत शुभ चिंतकों को सादर प्रणाम।*
जब संविधान का *अनुच्छेद 17* केवल इसलिए रखा गया कि आज यानी 26 जनवरी 1950 से छुआछूत प्रथा पूरी तरह से समाप्त हो जाएगी तो…
आज हमारे लोग यह कहें कि इन वंचित अतिपिछड़ी जातियों के साथ सामाजिक भेदभाव या छुआछूत नहीं है, *ऐसे लोग अज्ञानी हैं और संविधान को पढ़े नहीं हैं।*
*तथ्य सुनिए -*
*1.* 2014 से 2026 तक लगभग भारत के 18 राज्यों में भारत सरकार ने अनेकों नई जातियों को अनुसूचित जाति की सूची में सूचीबद्ध किया है।
*2.* अभी हाल ही में दो-चार दिन पहले मध्य प्रदेश सरकार ने चार जिलों में कुम्हार सहित अन्य वंचितों को अनुसूचित जाति में शामिल किया गया है, यानी अब कुल 12 जिलों में SC में हैं। तो यह कैसा कानून है कि एक ही राज्य में पृथक व्यवस्था?
*3.* उत्तर प्रदेश में 17 अतिपिछड़ी जातियां तो 1961 की गणना जो RGI भारत सरकार ने किया है, उसमें उत्तराखंड की तर्ज पर अनुसूचित जाति की सूची में सूचीबद्ध जातियों की ही उपजाति हैं और इन जातियों का कोई अलग से सर्वेक्षण करने की जरूरत नहीं है।
*अब सवाल यह है कि -*
भारत सरकार इन जातियों को अविलंब पुनः सूचीबद्ध करे या *RGI को समाप्त करे* इसलिए कि भारत सरकार RGI का बहाना बनाकर संवैधानिक संरक्षण रोकती है और कमोबेश सभी शोषित वंचितों का यही हाल है।
*अनिल कुमार प्रजापति*
*संस्थापक – अतिपिछड़ा एकीकरण महाअभियान (रजि.)*
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