शुरू न्यूज़
उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में जिला पंचायत अध्यक्षों को प्रशासक नियुक्त करने के राज्य सरकार के फैसले ने राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में एक तीखी बहस छेड़ दी है। अब तक की स्थापित परंपरा के विपरीत, जहाँ जिला पंचायत अध्यक्ष का कार्यकाल समाप्त होने के बाद जिलाधिकारी (डीएम) प्रशासक के रूप में कमान संभालते थे, सरकार ने इस बार यह जिम्मेदारी जिला पंचायत अध्यक्षों को ही सौंप दी है। सरकार के इस कदम को लेकर विपक्ष और आम जनता में भारी असंतोष है और स्थानीय स्तर पर लोग इस निर्णय को लोकतंत्र की स्वस्थ परंपराओं के विपरीत मान रहे हैं।
इस नए प्रशासनिक बदलाव के पीछे के उद्देश्यों पर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। आलोचकों का सीधा आरोप है कि इस नियुक्ति को अमलीजामा पहनाने के लिए 25 करोड़ रुपये से अधिक की एक बड़ी ‘डील’ की गई है। चर्चाओं का बाजार इस बात को लेकर भी गर्म है कि मंत्री ओमप्रकाश राजभर द्वारा की गई इस पैरवी का बड़ा खामियाजा भविष्य में भाजपा को भुगतना पड़ सकता है, जिससे पार्टी को चुनावी नुकसान होने की आशंका जताई जा रही है।
हालांकि, नई व्यवस्था के तहत प्रशासक बनाए गए इन अध्यक्षों के अधिकारों को काफी सीमित रखा गया है। प्रशासक के रूप में अध्यक्ष न तो कोई नीतिगत फैसला ले सकते हैं, न ही कोई टेंडर जारी कर सकते हैं और न ही भुगतान प्रक्रिया में किसी तरह का हस्तक्षेप कर सकते हैं। अब कार्ययोजना तैयार करने और टेंडर निकालने की पूरी प्रक्रिया डीएम के माध्यम से ही शासन को भेजी जाएगी और वहां से मंजूरी मिलने के बाद ही काम आगे बढ़ सकेगा। इस बड़े नीतिगत बदलाव के साथ ही, 12 जुलाई 2026 से संजय चौधरी ‘निवर्तमान अध्यक्ष’ की श्रेणी में आ गए हैं। इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब आगे क्या राजनीतिक मोड़ आता है, इस पर सभी की नजरें टिकी हैं।
अपना राज्य चुनें
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह
बिहार
छत्तीसगढ़
दिल्ली
हरियाणा
हिमाचल प्रदेश
झारखंड
मध्य प्रदेश
राजस्थान
उत्तर प्रदेश
उत्तराखंड