रक्षाबंधन के दिन घर के बड़े बेटे आशीष का निधन, बहनों की राखी रह गई अधूरी; दो मासूम बच्चों के सिर से उठा पिता का साया
रक्षाबंधन के दिन घर के बड़े बेटे आशीष का निधन, बहनों की राखी रह गई अधूरी; दो मासूम बच्चों के सिर से उठा पिता का साया
विंढमगंज। थाना क्षेत्र के बुटवेढ़वा निवासी आशीष चंद्रवंशी उर्फ डिम्पू (45 वर्ष), पुत्र लल्लू चंद्रवंशी का शुक्रवार की सुबह करीब तीन बजे वाराणसी में इलाज के दौरान निधन हो गया। वह पिछले कुछ दिनों से अस्वस्थ चल रहे थे और बनारस में उनका उपचार चल रहा था। निधन के बाद शुक्रवार को उनका शव घर पहुंचा तो परिवार में कोहराम मच गया। रक्षाबंधन के पावन पर्व पर हुई इस दुखद घटना से पूरे विंढमगंज बाजार क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई।आशीष परिवार के बड़े बेटे और अपनी बहनों के भाई थे। रक्षाबंधन के दिन जहां बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधकर उनकी लंबी उम्र और खुशहाल जीवन की कामना करती हैं, वहीं आशीष की बहनों के लिए यह पर्व जिंदगी भर का गहरा दर्द बन गया। जिस भाई की कलाई पर राखी बांधने की उम्मीद रही होगी, उसी दिन उसका पार्थिव शरीर घर पहुंचा। भाई को खोने का गम बहनों के लिए कितना असहनीय रहा होगा, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि घर में रक्षाबंधन की खुशियों की जगह चारों ओर मातम छा गया।आशीष बेहद मेहनती और सरल स्वभाव के व्यक्ति थे। वह अपनी आजीविका के लिए विंढमगंज बाजार में चाट-फुल्की का ठेला लगाते थे। इसी छोटी सी आमदनी से वह पत्नी और बच्चों का भरण-पोषण करते थे। आर्थिक परिस्थितियां भले ही सामान्य थीं, लेकिन बच्चों के भविष्य को लेकर उनका सपना बहुत बड़ा था।
परिजनों और परिचितों के अनुसार आशीष अपने दोनों बच्चों की पढ़ाई को लेकर काफी सजग रहते थे। वह अक्सर कहते थे कि “अपने बच्चों को खूब पढ़ाऊंगा और उन्हें अफसर बनाऊंगा।” बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए वह दिन-रात मेहनत करते थे। लेकिन अचानक बीमारी और असमय निधन ने उनके इस सपने को अधूरा छोड़ दिया।
आशीष अपने पीछे पत्नी और करीब 10 एवं 12 वर्ष के दो मासूम बच्चों को छोड़ गए हैं। पिता के निधन से दोनों बच्चों के सिर से पिता का साया उठ गया है। वहीं परिवार के सामने अब भरण-पोषण के साथ बच्चों की पढ़ाई जारी रखने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। जिस पिता ने अपने बच्चों को अफसर बनाने का सपना देखा था, आज उनके जाने के बाद यही सवाल परिवार और समाज के सामने है कि इन मासूम बच्चों का भविष्य अब कैसे संवरेगा। शुक्रवार को शव घर पहुंचते ही पत्नी, बच्चों और बहनों का रो-रोकर बुरा हाल हो गया। आशीष के अंतिम दर्शन के लिए रिश्तेदारों, परिचितों और स्थानीय लोगों की भीड़ जुट गई। बाजार के दुकानदार और उन्हें जानने वाले लोग भी उनके निधन से बेहद दुखी नजर आए।रक्षाबंधन का पर्व इस परिवार के लिए इस बार खुशियों के बजाय कभी न भूलने वाला गम दे गया। बहनों की राखी की डोर तो वही रहेगी, लेकिन अब उस कलाई पर भाई का हाथ हमेशा के लिए नहीं रहेगा। वहीं दो मासूम बच्चों के लिए पिता का साया और उनका अफसर बनने का सपना एक भावुक याद बनकर रह गया है।
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