साभार – हिन्दी समाचार पत्र दैनिक भारतीय बस्ती
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बंद करनी थी पाठशाला तो फिर क्यों सजाया गया स्कूल का आंगन?
उत्तर प्रदेश में सरकारी प्राथमिक विद्यालयों के विलय और बंद होने का मुद्दा अब केवल शिक्षा विभाग की फाइलों तक सीमित नहीं रह गया है। यह गांव की चौपाल से लेकर राजनीतिक मंच तक पहुंच चुका है। शिक्षक दिवस यानी 5 सितंबर, 2026 को समाजवादी पार्टी ने प्रदेशभर में ‘पाठशाला पुकारे’ अभियान चलाकर बंद किए गए प्राथमिक और जूनियर हाईस्कूलों के बाहर शिक्षक सम्मान और जनजागरूकता कार्यक्रम किए। अभियान का संदेश था—‘बंद स्कूल खुलेगा, तो PDA पढ़ेगा।’
लेकिन इस पूरे विवाद के बीच राजनीति से अलग एक ऐसा सवाल भी खड़ा होता है, जिसका जवाब केवल सरकार नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था को देना चाहिए—अगर किसी विद्यालय को आने वाले समय में बंद या दूसरे विद्यालय में विलय ही करना था, तो मर्जर के ठीक पूर्व उस विद्यालय की चारदीवारी क्यों बनाई गई? दिव्यांग शौचालय क्यों बनवाया गया? पेयजल की व्यवस्था क्यों की गई? भवनों की मरम्मत, रंगाई-पुताई और दूसरे बुनियादी ढांचे पर पैसा क्यों लगाया गया?
आज सोशल मीडिया पर बंद या विलय किए गए विद्यालयों की तस्वीरें और वीडियो तेजी से सामने आ रहे हैं। इनमें कई ऐसे विद्यालय दिखाई देते हैं जिनके परिसर में अपेक्षाकृत नया बाउंड्रीवाल है, शौचालय बने हैं, हैंडपंप या पेयजल की व्यवस्था है और भवन भी ठीक स्थिति में नजर आता है। तस्वीरें एक असहज सवाल खड़ा करती हैं—जिस स्कूल में सार्वजनिक धन खर्च करके आधारभूत सुविधाएं विकसित की गईं, उसे कुछ समय बाद अनुपयोगी क्यों होने दिया गया?
यहां यह स्पष्ट करना भी जरूरी है कि विद्यालयों के विलय का सरकारी तर्क सामान्यतः कम छात्र संख्या, संसाधनों के बेहतर उपयोग और बच्चों को अपेक्षाकृत बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने से जुड़ा रहा है। वर्ष 2025 में सरकार की ओर से यह भी कहा गया था कि एक किलोमीटर से अधिक दूरी वाले विद्यालयों तथा 50 से अधिक छात्रों वाले विद्यालयों का विलय नहीं किया जाएगा। इसलिए असली बहस ‘विलय होना चाहिए या नहीं’ से आगे बढ़कर योजना और प्राथमिकता की होनी चाहिए। मान लीजिए किसी गांव के प्राथमिक विद्यालय में छात्र संख्या लगातार कम हो रही थी। विभाग के पास वर्षों का नामांकन रिकॉर्ड था। ऐसे में क्या बाउंड्रीवाल, शौचालय, अतिरिक्त कक्ष, फर्नीचर या अन्य निर्माण कार्य स्वीकृत करने से पहले यह आकलन नहीं किया जाना चाहिए था कि अगले पांच-दस वर्षों तक विद्यालय वहां संचालित रहेगा या नहीं?
यदि भविष्य में विद्यालय के विलय की संभावना पहले से मौजूद थी और फिर भी उस पर लाखों रुपये खर्च किए गए, तो यह सिर्फ शिक्षा नीति का प्रश्न नहीं है। यह सार्वजनिक धन के नियोजन और उपयोग का प्रश्न भी है। दूसरी ओर, यदि उस समय विद्यालय को बंद करने का कोई प्रस्ताव नहीं था और परिस्थितियां बाद में बदलीं, तब भी सवाल खत्म नहीं होता। तब व्यवस्था को यह बताना चाहिए कि विद्यालय की छात्र संख्या क्यों घटी? क्या वहां शिक्षकों की पर्याप्त तैनाती थी? क्या समय पर शैक्षिक गुणवत्ता सुधारने के प्रयास हुए? क्या अभिभावकों को सरकारी स्कूल की ओर आकर्षित करने की कोई ठोस योजना बनाई गई? क्या आसपास के निजी विद्यालयों की तुलना में सरकारी विद्यालयों को बेहतर बनाने के प्रयास पर्याप्त थे?
क्योंकि किसी स्कूल में बच्चों की संख्या कम होना हमेशा उस स्कूल की जरूरत खत्म होने का प्रमाण नहीं होता। कई बार गांव की आबादी का पलायन, रोजगार के लिए परिवारों का बाहर जाना, निजी स्कूलों की बढ़ती संख्या, शिक्षकों की कमी, विद्यालय की खराब छवि या आसपास बेहतर सुविधाओं वाले दूसरे विद्यालय का प्रभाव भी नामांकन घटने का कारण हो सकता है। सबसे महत्वपूर्ण सवाल बच्चों का है। एक सरकारी विद्यालय केवल चार दीवारों और एक भवन का नाम नहीं होता। वह गांव के बच्चे के लिए उसके घर के सबसे नजदीक उपलब्ध शिक्षा का अधिकार होता है। खासकर छोटी कक्षाओं में पढ़ने वाले बच्चों, बालिकाओं और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए विद्यालय की दूरी बेहद महत्वपूर्ण होती है। एक किलोमीटर, दो किलोमीटर या उससे अधिक की अतिरिक्त दूरी कागज पर भले छोटी दिखाई दे, लेकिन छोटे बच्चे के लिए वह रोज की बड़ी चुनौती हो सकती है।
इसलिए विद्यालयों का विलय यदि किया भी जाए तो उसका आधार केवल छात्र संख्या नहीं होना चाहिए। दूरी, सड़क की स्थिति, बच्चों की उम्र, बालिकाओं की सुरक्षा, स्थानीय आबादी, भविष्य की जनसंख्या वृद्धि, परिवहन की उपलब्धता और विद्यालय की वास्तविक शैक्षिक स्थिति जैसे अनेक मानकों को साथ में देखना होगा। और सबसे बड़ा प्रश्न—जो विद्यालय आज बंद हो रहा है, उसकी जमीन और भवन का कल क्या होगा?
सरकारी विद्यालयों की भूमि सार्वजनिक संपत्ति है। यदि विद्यालय किसी दूसरे विद्यालय में विलय हो गया तो पुराने भवन और परिसर को खाली छोड़ देना समाधान नहीं हो सकता। ऐसे परिसरों के उपयोग को लेकर स्पष्ट नीति होनी चाहिए। उन्हें आवश्यकता के अनुसार आंगनबाड़ी केंद्र, ग्राम स्तरीय पुस्तकालय, कौशल विकास केंद्र, डिजिटल लर्निंग सेंटर, महिला एवं बाल गतिविधि केंद्र, युवा अध्ययन केंद्र या अन्य सार्वजनिक उपयोग में लाया जा सकता है। लेकिन सबसे पहले यह सुनिश्चित होना चाहिए कि विद्यालय बंद करने के बाद उसकी संपत्ति बेकार न पड़े।
यहीं ‘पाठशाला पुकारे’ अभियान का राजनीतिक पक्ष अपनी जगह है, लेकिन उससे उठे सवालों का प्रशासनिक पक्ष उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। समाजवादी पार्टी ने 5 सितंबर को इस मुद्दे को राजनीतिक बहस का विषय बनाया और दावा किया कि प्रदेश में बड़ी संख्या में प्राथमिक विद्यालय बंद किए गए हैं। अखिलेश यादव ने 26 हजार प्राथमिक विद्यालयों का आंकड़ा भी अपने सार्वजनिक बयान में रखा है। सरकार और विपक्ष के अलग-अलग आंकड़ों और दावों के बीच आम नागरिक के लिए सबसे जरूरी चीज है—तथ्य।
कितने विद्यालय वास्तव में बंद हुए? कितने विद्यालय दूसरे विद्यालयों में विलय किए गए? किन विद्यालयों में पिछले पांच वर्षों में कितना निर्माण कार्य हुआ? किस विद्यालय पर कितना पैसा खर्च हुआ? विद्यालय बंद होने के समय वहां कितने बच्चे पढ़ रहे थे? उन्हें कितनी दूरी पर स्थित विद्यालय में भेजा गया? पुराने विद्यालय की जमीन और भवन का अब क्या उपयोग हो रहा है?
इन सवालों का जवाब यदि जिला और ब्लॉक स्तर पर सार्वजनिक कर दिया जाए तो विवाद का बड़ा हिस्सा अपने आप समाप्त हो सकता है। दरअसल शिक्षा व्यवस्था में सबसे बड़ी गलती यह नहीं होगी कि किसी कम छात्र संख्या वाले विद्यालय का विलय कर दिया गया। बड़ी गलती तब होगी जब बिना दीर्घकालिक योजना के पहले पैसा खर्च किया जाए और बाद में उसी परिसंपत्ति को अनुपयोगी छोड़ दिया जाए।
सरकारी योजनाओं का उद्देश्य केवल निर्माण करना नहीं होना चाहिए। उद्देश्य यह होना चाहिए कि बनाया गया भवन, शौचालय, बाउंड्रीवाल, पानी की व्यवस्था, फर्नीचर और अन्य संसाधन वर्षों तक बच्चों के काम आएं। आज बंद पड़े किसी विद्यालय की तस्वीर में खड़ा नया बाउंड्रीवाल केवल ईंट और सीमेंट की दीवार नहीं है। वह उस सवाल की दीवार भी है जिसके दूसरी तरफ जवाब तलाशता हुआ गांव खड़ा है—जब विद्यालय को बचाना नहीं था तो उसे सजाया क्यों गया? और अगर उसे सजाने लायक समझा गया था, तो उसे बचाने की कोशिश क्यों नहीं की गई?
शिक्षा पर खर्च को केवल खर्च मानने के बजाय निवेश माना जाना चाहिए। विद्यालय में लगाया गया हर रुपया आने वाली पीढ़ी में लगाया गया रुपया है। इसलिए विद्यालय खोलना, चलाना, सुधारना और आवश्यकता पड़ने पर पुनर्गठित करना—इन सभी फैसलों में दूरदृष्टि जरूरी है। हो सकता है कुछ विद्यालयों का विलय प्रशासनिक दृष्टि से उचित हो। हो सकता है कुछ जगहों पर कम छात्र संख्या के कारण संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल आवश्यक हो। लेकिन हर विद्यालय की कहानी एक जैसी नहीं हो सकती। इसलिए अब जरूरत ‘स्कूल बंद करो या स्कूल खोलो’ की राजनीति से आगे बढ़कर ‘स्कूल बचाओ, शिक्षा सुधारो और सार्वजनिक धन का हिसाब दो’ की बहस की है।
क्योंकि सवाल सिर्फ एक भवन का नहीं है। सवाल उस बच्चे का है जो कल उसी रास्ते से स्कूल जाता। सवाल उस अभिभावक का है जिसने सरकारी स्कूल पर भरोसा किया। सवाल उस शिक्षक का है जिसने वर्षों तक वहां बच्चों को पढ़ाया। और सवाल उस सार्वजनिक धन का है जिससे स्कूल की दीवारें खड़ी हुईं। पाठशाला सचमुच पुकार रही है—उसे राजनीतिक नारों से ज्यादा एक स्पष्ट जवाब चाहिए कि उसका भविष्य क्या है।
✍️ अखिल कुमार यादव
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