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उत्तर प्रदेश में केंद्र सरकार की एथेनॉल मिश्रण नीति और राज्य सरकार की औद्योगिक प्रोत्साहन योजनाओं के तहत एथेनॉल उत्पादन को तेजी से बढ़ावा दिया जा रहा है। इसी औद्योगिक बदलाव के तहत बस्ती जिले के ग्राम दसिया में भी एक एथेनॉल फैक्ट्री प्रस्तावित है। इस परियोजना का उद्देश्य गन्ना उत्पादक किसानों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराना, ग्रामीण रोजगार सृजित करना और गन्ना आधारित अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है। हालांकि, इस परियोजना ने विकास की रफ्तार और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या विकास की कीमत स्थानीय लोगों को अपने स्वास्थ्य, जल और पर्यावरण को दांव पर लगाकर चुकानी पड़ेगी।
इस चिंता का मुख्य कारण यह है कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने डिस्टिलरी और एथेनॉल उद्योगों को सर्वाधिक प्रदूषण सूचकांक वाले उद्योगों की “रेड कैटेगरी” में रखा है। ऐसे उद्योगों पर सामान्य उद्योगों की तुलना में अधिक कड़े पर्यावरणीय और कानूनी मानक लागू होते हैं। इस परियोजना के लिए भूमि उपयोग परिवर्तन (CLU), स्थानीय मास्टर प्लान और जोनिंग नियमों के अनुरूप स्वीकृतियां प्राप्त करना अनिवार्य है। इसके साथ ही, पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986, जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम 1974 और वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम 1981 के प्रावधानों के तहत उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UPPCB) से कंसेंट टू एस्टेब्लिश (CTE) और कंसेंट टू ऑपरेट (CTO) हासिल करना भी आवश्यक है। जनविश्वास बनाए रखने के लिए इन सभी स्वीकृतियों की जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए।
एथेनॉल संयंत्रों में भारी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है और इससे ‘स्पेंट वॉश’ जैसे औद्योगिक कचरे उत्पन्न होते हैं। यदि इनका वैज्ञानिक उपचार न किया जाए, तो भूजल, नदियों, तालाबों और कृषि भूमि पर गंभीर असर पड़ सकता है। इसी वजह से जीरो लिक्विड डिस्चार्ज (ZLD) प्रणाली के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर दिया जा रहा है। स्थानीय आबादी इस बात को लेकर बेहद चिंतित है कि इस फैक्ट्री से निकलने वाले धुएं, दुर्गंध, शोर और अपशिष्ट जल का प्रभाव आसपास के गांवों, स्कूलों, आंगनबाड़ी केंद्रों, अस्पतालों और पेयजल स्रोतों पर क्या पड़ेगा। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के ‘एहतियाती सिद्धांत’ और ‘प्रदूषण फैलाने वाला भुगतान करेगा’ के सिद्धांतों के तहत ऐसी परियोजनाओं का मूल्यांकन केवल निवेश और रोजगार नहीं, बल्कि पर्यावरणीय जिम्मेदारी के आधार पर होना चाहिए।
यदि यह परियोजना सभी कानूनी मानकों का कड़ाई से पालन करती है और आधुनिक प्रदूषण तकनीक अपनाती है, तो इससे स्थानीय युवाओं को रोजगार, परिवहन व व्यापार में वृद्धि और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था का विस्तार जैसे सकारात्मक परिणाम भी मिल सकते हैं। कंपनी को कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) के तहत स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल और वृक्षारोपण में ठोस योगदान देना चाहिए। लेखक अखिल कुमार यादव के अनुसार, दसिया एथेनॉल फैक्ट्री को लेकर आज अंधाधुंध विरोध या समर्थन के बजाय तथ्यों और पारदर्शिता की जरूरत है, ताकि किसानों व युवाओं के आर्थिक विकास के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ जल, वायु और सुरक्षित पर्यावरण भी सुनिश्चित हो सके।
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