पूरे समाज या सैकड़ों लोगों को बुलाकर बड़ा मृत्यु भोज कराना शास्त्रों का नियम नहीं है। यह बाद में बनी एक सामाजिक परंपरा है। महाभारत और अन्य ग्रंथों में भी दुख के समय किसी परिवार पर आर्थिक बोझ डालकर विशाल भोज कराने को अनुचित बताया गया है।
शास्त्रों, सामाजिक परंपराओं और नेपाल एवं भारत की प्रथाओं के आधार पर इस विषय की सरल और सादी जानकारी नीचे दी गई है।
१. शास्त्रों में मृत्यु भोज और ब्राह्मण भोजन का नियम
हिंदू शास्त्रों जैसे गरुड़ पुराण और मनुस्मृति में मृत्यु के बाद होने वाले संस्कारों के बारे में बताया गया है। देहांत के बाद दसवें से तेरहवें दिन तक श्राद्ध और पिंड दान की प्रक्रिया होती है। इस दौरान आत्मा की शांति के लिए केवल एक या कुछ सात्विक ब्राह्मणों को भोजन कराने और दान देने का विधान है।
पूरे समाज या सैकड़ों लोगों को बुलाकर बड़ा मृत्यु भोज कराना शास्त्रों का नियम नहीं है। यह बाद में बनी एक सामाजिक परंपरा है। महाभारत और अन्य ग्रंथों में भी दुख के समय किसी परिवार पर आर्थिक बोझ डालकर विशाल भोज कराने को अनुचित बताया गया है।
२. नेपाल की परंपरा और शवयात्रा में जाने वालों को भोजन
नेपाल में मृत्यु संस्कारों की व्यवस्था थोड़ी अलग और व्यावहारिक है। नेपाल में जो लोग दाह संस्कार या शमशान घाट में जाते हैं, उन्हें मलमी कहा जाता है। दाह संस्कार के बाद या तेरहवें दिन शुद्धि के बाद इन सहयोगियों को भोजन कराने का रिवाज है। इसके पीछे की सोच यह है कि जो लोग दुख की घड़ी में साथ खड़े रहे और कंधा दिया, उनके प्रति आभार व्यक्त किया जाए।
नेपाल में भी तेरहवें दिन पूजा संपन्न कराने वाले कुल पुरोहित या ब्राह्मण को भोजन और दान दिया जाता है। लेकिन भारत के कुछ हिस्सों की तरह सैकड़ों लोगों को बड़े स्तर पर मृत्यु भोज देने का चलन वहाँ नहीं है।
३. यह अंतर क्यों है
धर्मशास्त्रों में स्थानीय परंपराओं और देशकाल का सम्मान किया गया है। उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में तेरहवीं ने एक बड़े सामाजिक भोज का रूप ले लिया, जिसे अब कई लोग एक सामाजिक बोझ भी मानते हैं। इसके विपरीत नेपाल में शास्त्रों के मूल रूप को बनाए रखा गया, जहाँ केवल पुरोहित द्वारा श्राद्ध कराया जाता है और दुख में साथ देने वाले नजदीकी लोगों को सादगी से भोजन कराया जाता है।
निष्कर्ष
शास्त्रों में मृत्यु के बाद केवल पूजा कराने वाले ब्राह्मणों को श्राद्ध के हिस्से के रूप में भोजन कराने की बात कही गई है, न कि पूरे समाज को खाना खिलाने की। नेपाल में शवयात्रा में जाने वाले लोगों को भोजन कराना एक सामाजिक आभार और व्यावहारिक परंपरा है, जो परिवार को बेवजह के दिखावे और बड़े खर्च से बचाती है।
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