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जाम नदी का रपटा बना मौत का जाल: भंदारगोंदी के ग्रामीण जनप्रतिनिधियों से निराश

NILESH KALASKAR

पांढुर्णा मुख्यालय से मात्र दो किलोमीटर दूर स्थित ग्राम भंदारगोंदी के ग्रामीण आजादी के इतने वर्षों बाद भी मुख्यधारा से कटे हुए हैं। उन्हें जिला मुख्यालय से जोड़ने वाली जाम नदी पर बना रपटा अब एक बड़ी मुसीबत बन गया है, जो बरसात शुरू होते ही पानी में डूब जाता है और भंदारगोंदी सहित आसपास के गांवों का संपर्क पूरी तरह टूट जाता है। हल्की सी बारिश में ही जाम नदी उफान पर आ जाती है, जिससे घंटों तक रपटे के ऊपर से पानी का तेज बहाव होता है। यह रपटा कई जगह से क्षतिग्रस्त हो चुका है, जिससे किसी भी समय बड़ी अनहोनी का खतरा बना रहता है। ऐसी स्थिति में, गंभीर बीमारी या आपातकाल में मरीजों को अस्पताल ले जाने का कोई विकल्प नहीं बचता, और उन्हें मौत के मुंह में छोड़ना पड़ता है।

ग्रामीणों को सत्ता परिवर्तन के बाद जाम नदी पर पुलिया निर्माण की उम्मीद थी, लेकिन अब उनकी यह आशा टूट रही है। क्षेत्रवासियों का आरोप है कि चुनाव के दौरान वोट लेने के बाद स्थानीय भाजपा सांसद ने इस समस्या की ओर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया। जनता ने जिस भरोसे के साथ उन्हें चुनकर संसद भेजा था, उसी क्षेत्र की बदहाली और इस जानलेवा रपटे की सच्चाई या तो सांसद तक पहुंची नहीं, या उन्होंने इसे पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया, जो एक गंभीर सवाल खड़ा करता है।

इतना ही नहीं, ग्रामीणों का गुस्सा स्थानीय पंचायत प्रतिनिधियों पर भी फूट रहा है। उनका आरोप है कि भारी बहुमत से चुने गए जनप्रतिनिधि अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में विफल रहे हैं। वे या तो अपनी ही जनता की समस्याओं को उच्च अधिकारियों, विधायक और सांसद तक पहुंचाने में अक्षम हैं, या फिर वे इस उपेक्षा में पूरी तरह शामिल हैं। भंदारगोंदी और देवखापा के सैकड़ों ग्रामीण अब दोराहे पर खड़े हैं। उन्हें आशंका है कि यदि समय रहते इस पुलिया का निर्माण नहीं हुआ और प्रशासन ने आंखें नहीं खोलीं, तो शायद किसी बड़ी दुर्घटना के बाद ही यह सोया हुआ प्रशासन जागेगा। ग्रामीणों का सवाल है कि आखिर कब तक आम जनता अपनी जान हथेली पर रखकर इस जानलेवा रपटे से गुजरने को मजबूर रहेगी, क्योंकि जाम नदी का रपटा उनके लिए मौत का जाल बन चुका है और उनकी दुर्दशा पर प्रशासनिक तंत्र व लापरवाह जनप्रतिनिधि खामोश हैं।



Aakash Mandrah
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