गैर इरादतन हत्या के केस में नामजद डॉक्टर की पत्रकारों पर अश्लील टिप्पणी, बोले- “पैंट उतरवाने के लिए प्रार्थना करूं तो…”
पुवायां/शाहजहांपुर। पुवायां के चरक अस्पताल में प्रसव के बाद महिला की मौत के मामले में गैर इरादतन हत्या के मुकदमे में नामजद डॉक्टर केपी गुप्ता का एक कथित मीडिया बयान सामने आया है। आरोप है कि डॉक्टर ने मामले की खबर प्रकाशित करने वाले पत्रकारों को लेकर बेहद आपत्तिजनक और अश्लील भाषा का इस्तेमाल किया। बयान में महिला पत्रकारों को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं, जिससे पत्रकारिता जगत में नाराजगी बढ़ सकती है।
मामला पुवायां कोतवाली क्षेत्र के जेवां गांव से जुड़ा है। दर्ज एफआईआर के अनुसार, जोगराज की बहू जूली को 8 सितंबर को प्रसव पीड़ा हुई थी। परिजन उसे पुवायां स्थित चरक अस्पताल लेकर पहुंचे। आरोप है कि अस्पताल में मौजूद डॉ. फिरोज ने ऑपरेशन के लिए शहर से डॉ. केपी गुप्ता को बुलाया।
परिजनों ने आरोप लगाया कि ऑपरेशन के दौरान डॉक्टर की स्थिति ठीक नहीं थी और इलाज में लापरवाही बरती गई। बच्चे के जन्म के बाद महिला की हालत बिगड़ने पर उसे बरेली रेफर किया गया, लेकिन रास्ते में उसकी मौत हो गई।
महिला की मौत के बाद परिजनों की शिकायत पर पुवायां कोतवाली में डॉ. फिरोज और डॉ. केपी गुप्ता के खिलाफ बीएनएस की धारा 105 (गैर इरादतन हत्या) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।
मामला यहीं खत्म नहीं होता…
मुकदमा दर्ज होने के बाद इस प्रकरण से संबंधित खबरें सामने आईं। इसी बीच आरोपी डॉक्टर केपी गुप्ता का एक कथित बयान सामने आया, जिसमें उन्होंने खबर लिखने वाले पत्रकारों के लिए कथित तौर पर “चड्डी” और “पैंट उतरवाने” जैसी अश्लील भाषा का इस्तेमाल किया।
सवाल यह है कि किसी डॉक्टर को अपने ऊपर लगे आरोपों का जवाब देने, अपना पक्ष रखने और खबरों का खंडन करने का पूरा अधिकार है। यदि किसी खबर में तथ्य गलत हैं तो डॉक्टर कानूनी नोटिस, खंडन या संबंधित कानूनी प्रक्रिया का सहारा ले सकते हैं। लेकिन क्या किसी पेशेवर व्यक्ति के लिए पत्रकारों को लेकर सार्वजनिक रूप से इस तरह की अश्लील टिप्पणी करना उचित है?
खासकर तब, जब मीडिया संस्थानों में महिला पत्रकार भी काम करती हैं, ऐसी भाषा केवल संबंधित पत्रकार को निशाना बनाने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पत्रकारिता के पूरे पेशे की गरिमा पर सवाल खड़े करती है।
आरोपों का फैसला अदालत में, भाषा की मर्यादा समाज के हाथ में
महिला की मौत के मामले में लगाए गए आरोप सही हैं या नहीं, इसका अंतिम फैसला जांच और न्यायिक प्रक्रिया से होना है। डॉक्टर को भी अपना पक्ष रखने और खुद को निर्दोष साबित करने का पूरा अधिकार है। इसी तरह पत्रकारों को एफआईआर और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर खबर प्रकाशित करने का अधिकार है, बशर्ते खबर तथ्यात्मक और जिम्मेदार तरीके से प्रकाशित की गई हो।
लेकिन आरोपों का जवाब अश्लील भाषा से देना किसी भी पक्ष के हित में नहीं है।
एक तरफ एक महिला की मौत का गंभीर मामला जांच के दायरे में है, दूसरी तरफ उसी मामले की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को लेकर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी सामने आना अलग बहस खड़ी करता है। जरूरत इस बात की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो, आरोपों की सच्चाई सामने आए और सार्वजनिक बयान देते समय सभी पक्ष अपनी भाषा की मर्यादा बनाए रखें।
नोट: डॉक्टर केपी गुप्ता पर लगाए गए लापरवाही संबंधी आरोप एफआईआर/परिजनों के आरोपों पर आधारित हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और अंतिम कानूनी निष्कर्ष जांच एवं न्यायालय की प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगा।
गैर इरादतन हत्या के केस में नामजद डॉक्टर की पत्रकारों पर अश्लील टिप्पणी, बोले- “पैंट उतरवाने के लिए प्रार्थना करूं तो…”
पुवायां/शाहजहांपुर। पुवायां के चरक अस्पताल में प्रसव के बाद महिला की मौत के मामले में गैर इरादतन हत्या के मुकदमे में नामजद डॉक्टर केपी गुप्ता का एक कथित मीडिया बयान सामने आया है। आरोप है कि डॉक्टर ने मामले की खबर प्रकाशित करने वाले पत्रकारों को लेकर बेहद आपत्तिजनक और अश्लील भाषा का इस्तेमाल किया। बयान में महिला पत्रकारों को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं, जिससे पत्रकारिता जगत में नाराजगी बढ़ सकती है।
मामला पुवायां कोतवाली क्षेत्र के जेवां गांव से जुड़ा है। दर्ज एफआईआर के अनुसार, जोगराज की बहू जूली को 8 सितंबर को प्रसव पीड़ा हुई थी। परिजन उसे पुवायां स्थित चरक अस्पताल लेकर पहुंचे। आरोप है कि अस्पताल में मौजूद डॉ. फिरोज ने ऑपरेशन के लिए शहर से डॉ. केपी गुप्ता को बुलाया।
परिजनों ने आरोप लगाया कि ऑपरेशन के दौरान डॉक्टर की स्थिति ठीक नहीं थी और इलाज में लापरवाही बरती गई। बच्चे के जन्म के बाद महिला की हालत बिगड़ने पर उसे बरेली रेफर किया गया, लेकिन रास्ते में उसकी मौत हो गई।
महिला की मौत के बाद परिजनों की शिकायत पर पुवायां कोतवाली में डॉ. फिरोज और डॉ. केपी गुप्ता के खिलाफ बीएनएस की धारा 105 (गैर इरादतन हत्या) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।
मामला यहीं खत्म नहीं होता…
मुकदमा दर्ज होने के बाद इस प्रकरण से संबंधित खबरें सामने आईं। इसी बीच आरोपी डॉक्टर केपी गुप्ता का एक कथित बयान सामने आया, जिसमें उन्होंने खबर लिखने वाले पत्रकारों के लिए कथित तौर पर “चड्डी” और “पैंट उतरवाने” जैसी अश्लील भाषा का इस्तेमाल किया।
सवाल यह है कि किसी डॉक्टर को अपने ऊपर लगे आरोपों का जवाब देने, अपना पक्ष रखने और खबरों का खंडन करने का पूरा अधिकार है। यदि किसी खबर में तथ्य गलत हैं तो डॉक्टर कानूनी नोटिस, खंडन या संबंधित कानूनी प्रक्रिया का सहारा ले सकते हैं। लेकिन क्या किसी पेशेवर व्यक्ति के लिए पत्रकारों को लेकर सार्वजनिक रूप से इस तरह की अश्लील टिप्पणी करना उचित है?
खासकर तब, जब मीडिया संस्थानों में महिला पत्रकार भी काम करती हैं, ऐसी भाषा केवल संबंधित पत्रकार को निशाना बनाने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पत्रकारिता के पूरे पेशे की गरिमा पर सवाल खड़े करती है।
आरोपों का फैसला अदालत में, भाषा की मर्यादा समाज के हाथ में
महिला की मौत के मामले में लगाए गए आरोप सही हैं या नहीं, इसका अंतिम फैसला जांच और न्यायिक प्रक्रिया से होना है। डॉक्टर को भी अपना पक्ष रखने और खुद को निर्दोष साबित करने का पूरा अधिकार है। इसी तरह पत्रकारों को एफआईआर और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर खबर प्रकाशित करने का अधिकार है, बशर्ते खबर तथ्यात्मक और जिम्मेदार तरीके से प्रकाशित की गई हो।
लेकिन आरोपों का जवाब अश्लील भाषा से देना किसी भी पक्ष के हित में नहीं है।
एक तरफ एक महिला की मौत का गंभीर मामला जांच के दायरे में है, दूसरी तरफ उसी मामले की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को लेकर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी सामने आना अलग बहस खड़ी करता है। जरूरत इस बात की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो, आरोपों की सच्चाई सामने आए और सार्वजनिक बयान देते समय सभी पक्ष अपनी भाषा की मर्यादा बनाए रखें।
नोट: डॉक्टर केपी गुप्ता पर लगाए गए लापरवाही संबंधी आरोप एफआईआर/परिजनों के आरोपों पर आधारित हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और अंतिम कानूनी निष्कर्ष जांच एवं न्यायालय की प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगा।
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