लेखपाल की कुर्सी पर बैठा ‘पत्रकार’ और सामने पत्रकार पर रौब! वायरल वीडियो ने खोली तहसील की कार्यप्रणाली की पोल?
लखीमपुर खीरी। सदर तहसील परिसर से सामने आए एक वायरल वीडियो ने सरकारी कार्यालयों की कार्यप्रणाली के साथ-साथ पत्रकारिता की आड़ में प्रभाव जमाने की कोशिशों को लेकर भी कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वीडियो में विशाल भारद्वाज नामक व्यक्ति लेखपाल के पास बैठा नजर आ रहा है। इसी दौरान एक अन्य पत्रकार द्वारा लेखपाल से मिलने की बात कहे जाने पर बातचीत कथित तौर पर तीखी होती दिखाई देती है।
वीडियो में जिस अंदाज में दूसरे पत्रकार से बातचीत होती नजर आ रही है, उसे लेकर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर एक सरकारी कर्मचारी से मिलने आए व्यक्ति को रोकने या उस पर रौब जमाने का अधिकार किसने दिया?
सरकारी कुर्सी पर बैठकर आखिर किस बात का ‘रौब’?
मामला केवल दो लोगों के बीच हुई बहस का नहीं है। सवाल यह भी है कि तहसील जैसे सरकारी परिसर में कोई बाहरी व्यक्ति कर्मचारी के पास बैठकर इस तरह हस्तक्षेप कर सकता है या नहीं।
अगर वीडियो में दिखाई दे रहा घटनाक्रम वास्तविक है तो यह भी जांच का विषय है कि उस समय लेखपाल की मौजूदगी में बातचीत किस संदर्भ में हुई और क्या किसी फरियादी अथवा पत्रकार को सरकारी कर्मचारी से मिलने से रोकने का प्रयास किया गया?
क्या तहसील परिसर में पहुंचने वाले हर व्यक्ति को किसी कथित प्रभावशाली व्यक्ति से अनुमति लेनी होगी?
‘पत्रकार’ कौन और अधिकार कितना?
सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति का स्वयं को पत्रकार बताना अलग बात है और पत्रकारिता के अधिकारों एवं मर्यादाओं का पालन करना अलग। ऐसे में प्रशासन के सामने यह सवाल भी है कि सरकारी कार्यालय में बैठकर किसी अन्य पत्रकार के साथ कथित रूप से दबावपूर्ण व्यवहार करने की स्थिति को किस नजर से देखा जाएगा।
वीडियो ने एक और सवाल खड़ा किया है—क्या सरकारी कार्यालय किसी व्यक्ति के व्यक्तिगत प्रभाव प्रदर्शन का स्थान है?
सोशल मीडिया के आरोपों की भी हो निष्पक्ष जांच
वहीं, विशाल भारद्वाज को लेकर सोशल मीडिया पर पुराने विवादों, मुकदमों और अधिकारियों के संबंध में कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों से जुड़े अलग-अलग दावे भी प्रसारित होने की बात सामने आ रही है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है और केवल सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
इसीलिए जरूरत है कि प्रशासन वायरल वीडियो और उससे जुड़े दावों की तथ्यात्मक एवं निष्पक्ष जांच कराए।
अब तहसील प्रशासन से सीधे सवाल
– वायरल वीडियो कब और किस स्थान का है?
– वीडियो में दिखाई दे रहे व्यक्ति की तहसील परिसर में मौजूदगी किस उद्देश्य से थी?
– क्या वह लेखपाल की अनुमति से वहां बैठा था?
– क्या किसी पत्रकार या फरियादी को लेखपाल से मिलने से रोकने का प्रयास हुआ?
– क्या तहसील प्रशासन ने वीडियो का संज्ञान लिया है?
– यदि सरकारी कार्यालय की मर्यादा भंग करने या किसी व्यक्ति पर अनुचित दबाव डालने की पुष्टि होती है, तो जिम्मेदार लोगों पर क्या कार्रवाई होगी?
वीडियो सामने है, सवाल सामने हैं—अब जरूरत है जवाब की।
तहसील जैसे सरकारी परिसर में कौन बैठ सकता है, किसे किससे मिलने से रोका जा सकता है और किसी व्यक्ति को सरकारी कर्मचारी की कुर्सी के पास बैठकर दूसरे नागरिक पर रौब जमाने का अधिकार है या नहीं—इन सवालों पर प्रशासन की चुप्पी से ज्यादा जरूरी है निष्पक्ष जांच और स्पष्ट जवाबदेही।
लेखपाल की कुर्सी पर बैठा ‘पत्रकार’ और सामने पत्रकार पर रौब! वायरल वीडियो ने खोली तहसील की कार्यप्रणाली की पोल?
लखीमपुर खीरी। सदर तहसील परिसर से सामने आए एक वायरल वीडियो ने सरकारी कार्यालयों की कार्यप्रणाली के साथ-साथ पत्रकारिता की आड़ में प्रभाव जमाने की कोशिशों को लेकर भी कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वीडियो में विशाल भारद्वाज नामक व्यक्ति लेखपाल के पास बैठा नजर आ रहा है। इसी दौरान एक अन्य पत्रकार द्वारा लेखपाल से मिलने की बात कहे जाने पर बातचीत कथित तौर पर तीखी होती दिखाई देती है।
वीडियो में जिस अंदाज में दूसरे पत्रकार से बातचीत होती नजर आ रही है, उसे लेकर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर एक सरकारी कर्मचारी से मिलने आए व्यक्ति को रोकने या उस पर रौब जमाने का अधिकार किसने दिया?
सरकारी कुर्सी पर बैठकर आखिर किस बात का ‘रौब’?
मामला केवल दो लोगों के बीच हुई बहस का नहीं है। सवाल यह भी है कि तहसील जैसे सरकारी परिसर में कोई बाहरी व्यक्ति कर्मचारी के पास बैठकर इस तरह हस्तक्षेप कर सकता है या नहीं।
अगर वीडियो में दिखाई दे रहा घटनाक्रम वास्तविक है तो यह भी जांच का विषय है कि उस समय लेखपाल की मौजूदगी में बातचीत किस संदर्भ में हुई और क्या किसी फरियादी अथवा पत्रकार को सरकारी कर्मचारी से मिलने से रोकने का प्रयास किया गया?
क्या तहसील परिसर में पहुंचने वाले हर व्यक्ति को किसी कथित प्रभावशाली व्यक्ति से अनुमति लेनी होगी?
‘पत्रकार’ कौन और अधिकार कितना?
सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति का स्वयं को पत्रकार बताना अलग बात है और पत्रकारिता के अधिकारों एवं मर्यादाओं का पालन करना अलग। ऐसे में प्रशासन के सामने यह सवाल भी है कि सरकारी कार्यालय में बैठकर किसी अन्य पत्रकार के साथ कथित रूप से दबावपूर्ण व्यवहार करने की स्थिति को किस नजर से देखा जाएगा।
वीडियो ने एक और सवाल खड़ा किया है—क्या सरकारी कार्यालय किसी व्यक्ति के व्यक्तिगत प्रभाव प्रदर्शन का स्थान है?
सोशल मीडिया के आरोपों की भी हो निष्पक्ष जांच
वहीं, विशाल भारद्वाज को लेकर सोशल मीडिया पर पुराने विवादों, मुकदमों और अधिकारियों के संबंध में कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों से जुड़े अलग-अलग दावे भी प्रसारित होने की बात सामने आ रही है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है और केवल सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
इसीलिए जरूरत है कि प्रशासन वायरल वीडियो और उससे जुड़े दावों की तथ्यात्मक एवं निष्पक्ष जांच कराए।
अब तहसील प्रशासन से सीधे सवाल
– वायरल वीडियो कब और किस स्थान का है?
– वीडियो में दिखाई दे रहे व्यक्ति की तहसील परिसर में मौजूदगी किस उद्देश्य से थी?
– क्या वह लेखपाल की अनुमति से वहां बैठा था?
– क्या किसी पत्रकार या फरियादी को लेखपाल से मिलने से रोकने का प्रयास हुआ?
– क्या तहसील प्रशासन ने वीडियो का संज्ञान लिया है?
– यदि सरकारी कार्यालय की मर्यादा भंग करने या किसी व्यक्ति पर अनुचित दबाव डालने की पुष्टि होती है, तो जिम्मेदार लोगों पर क्या कार्रवाई होगी?
वीडियो सामने है, सवाल सामने हैं—अब जरूरत है जवाब की।
तहसील जैसे सरकारी परिसर में कौन बैठ सकता है, किसे किससे मिलने से रोका जा सकता है और किसी व्यक्ति को सरकारी कर्मचारी की कुर्सी के पास बैठकर दूसरे नागरिक पर रौब जमाने का अधिकार है या नहीं—इन सवालों पर प्रशासन की चुप्पी से ज्यादा जरूरी है निष्पक्ष जांच और स्पष्ट जवाबदेही।
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