सावन की बूंदों में शिव, सनातन की सांसों में गुरु गोरखनाथ, आस्था का त्रिवेणी संगम____________________
राघवेन्द्र त्रिपाठी संवाददाता विधान केसरी संत कबीर नगर
संत कबीर नगर 10 अगस्त 2026,
सावन का महीना आते ही सनातन धर्म की रगों में भक्ति का नया रक्त दौड़ने लगता है। काले बादल, ठंडी फुहारें और हरियाली से लदी धरती स्वयं शिव का आह्वान करती प्रतीत होती है। सनातन परंपरा में सावन केवल एक महीना नहीं, यह आत्मा के शुद्धिकरण का महापर्व है। शास्त्रों के अनुसार इसी माह में समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष को भगवान शिव ने अपने कंठ में धारण कर समस्त सृष्टि को बचाया था। उसी त्याग की स्मृति में करोड़ों शिवभक्त पूरे माह जल, दूध, बेलपत्र और धतूरा चढ़ाकर “ॐ नमः शिवाय” का जप करते हैं। सावन की प्रत्येक सोमवारी पर शिवालयों में पैर रखने की जगह नहीं बचती। कावड़ियों की टोलियां “बोल बम” के उद्घोष के साथ गंगा जल लेकर सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलती हैं। महिलाओं के झूले, खेतों में लहराती फसलें और मंदिरों में गूंजते शंख-घंटे मिलकर यह प्रमाण देते हैं कि सनातन धर्म प्रकृति से कटकर नहीं, प्रकृति के साथ जीने की कला है। सनातन की गहरी आस्था यही है कि ईश्वर मंदिर की चारदीवारी में नहीं, कण-कण में, पत्ते-पत्ते में और बरसात की हर बूंद में विद्यमान है।
भगवान शिव सनातन के मूल आधार हैं। वे संहारक कम और कल्याणकारी अधिक हैं। त्रिशूल में सृष्टि-पालन-संहार का संतुलन, डमरू में नाद ब्रह्म और जटाओं में गंगा लिए शिव योगी भी हैं और गृहस्थ भी। “शिवो भूत्वा शिवं यजेत” अर्थात शिव बनकर ही शिव की पूजा करो – यही सनातन का मूल मंत्र है। सनातन कोई संप्रदाय नहीं, यह अनादि जीवन पद्धति है जो व्रत, तप, सेवा, गुरु भक्ति और सत्य के मार्ग से मनुष्य को ईश्वर तक ले जाती है। इसी मार्ग को सरल और व्यावहारिक रूप दिया गुरु गोरखनाथ ने। नाथ संप्रदाय के प्रवर्तक, शिव के अवतार माने जाने वाले गुरु गोरखनाथ का साधना स्थल गोरखपुर आज भी लाखों श्रद्धालुओं का केंद्र है। उन्होंने कहा, “पहले तन साधो, फिर मन साधो, तब आपे आप मिल जाए राम।” उन्होंने योग, हठयोग और कुंडलिनी साधना को जन-जन तक पहुंचाया और समाज में फैले आडंबर को तोड़कर सीधी भक्ति का मार्ग दिया। सनातन धर्म और गुरु गोरखनाथ से जुड़ी आस्था केवल कथाओं तक सीमित नहीं, जनमानस में इसके अनगिनत चमत्कार आज भी जीवित हैं। कहा जाता है कि गोरखनाथ मंदिर में सच्चे मन से मांगी गई मन्नत खाली नहीं जाती। सावन में यहां “नौ नाथ” और “84 सिद्धों” की उपस्थिति महसूस की जाती है। कई भक्त बताते हैं कि असाध्य रोग, बेरोजगारी और कोर्ट-कचहरी के मामले केवल एक बार “आदेश आदेश” कहकर माथा टेकने से सुलझ गए। कावड़ यात्रा में भी चमत्कार देखने को मिलते हैं, 40 डिग्री की धूप, नंगे पैर, कंधे पर 20 किलो की कावड़, फिर भी भक्त थकान महसूस नहीं करता। इसे शिव की कृपा ही माना जाता है। रुद्राभिषेक के समय शिवलिंग से स्वयं जल की धारा निकलना, बेलपत्र पर त्रिशूल का निशान बन जाना जैसी घटनाएं सनातनियों की आस्था को और दृढ़ करती हैं। अंततः सावन हमें शिव से जोड़ता है, शिव सनातन की आत्मा हैं, और सनातन को साधना का विज्ञान गुरु गोरखनाथ ने दिया। सावन की फुहार में शिव का तांडव है, मंदिर की घंटी में सनातन की गूंज है और “आदेश आदेश” में गुरु गोरखनाथ का आशीर्वाद है। ये चारों अलग नहीं, एक ही सत्य के चार रूप हैं – त्याग, तप, ज्ञान और कल्याण।
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