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बस्ती में ‘डिजिटल इंडिया’ की हकीकत: जिंदा युवती को कागजों में ‘मृत’ बताया!

अजीत मिश्रा (खोजी)

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले से सरकारी तंत्र की संवेदनहीनता और अमानवीय लापरवाही का एक काला चिट्ठा सामने आया है। रतनपुर अर्जुन गांव की 23 वर्षीय सुमन चौधरी को सरकारी रिकॉर्ड में ‘मृत’ घोषित कर दिया गया है, जबकि वह आज भी अपने ‘जीवित’ होने का सबूत देने के लिए दर-दर भटक रही है। यह मामला एक ओर जहां सरकार के ‘डिजिटल इंडिया’ के दावों की पोल खोलता है, वहीं दूसरी ओर प्रशासनिक व्यवस्था की सड़ चुकी हकीकत और बिना सोचे-समझे किसी की पहचान मिटा देने पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

सुमन चौधरी का जन्म 17 अगस्त 2002 को हुआ था, लेकिन 17 मई 2017 को तत्कालीन ग्राम पंचायत अधिकारी ने अपनी कलम से उन्हें कागजों में ‘मृत’ घोषित कर दिया। यह महज एक क्लर्क की गलती नहीं, बल्कि प्रशासनिक तंत्र पर एक करारा तमाचा है, जिसने बिना सोचे-समझे एक जीवित युवती की पहचान मिटा दी। यह लापरवाही तब और भी गंभीर हो जाती है जब सुमन ने वर्ष 2019 में हाईस्कूल की परीक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की थी। इसे महज एक टाइपिंग की गलती नहीं, बल्कि सोची-समझी साजिश या फिर चरम लापरवाही की पराकाष्ठा बताया गया है। सरकारी रिकॉर्ड में हुई इस ‘मौत’ ने सुमन के मौलिक अधिकारों और उसके भविष्य को दांव पर लगा दिया है। वह पिता की संपत्ति में अपना हक पाने और सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए संघर्ष कर रही है, क्योंकि आधार से लेकर अन्य दस्तावेजों तक, हर जगह ‘मृत’ का यह ठप्पा उसके सपनों के रास्ते का रोड़ा बन गया है।

सुमन ने इस गंभीर मामले में जिलाधिकारी से न्याय की गुहार लगाते हुए रिकॉर्ड में सुधार की मांग की है। हालांकि, सबसे बड़ा सवाल यह है कि उस ‘साहब’ का क्या होगा, जिसने अपनी एक कलम से एक जीवित लड़की को ‘मरा हुआ’ बता दिया? अक्सर ऐसे मामलों में जांच के नाम पर फाइलों को सिर्फ घुमा दिया जाता है और दोषी अधिकारी बिना किसी कार्रवाई के रिटायर होकर अपनी पेंशन का आनंद लेते हैं। यदि प्रशासन इस मामले में दोषी ग्राम पंचायत अधिकारी और संबंधित कर्मचारियों पर कड़ी अनुशासनात्मक और दंडात्मक कार्रवाई नहीं करता, तो यह स्पष्ट संदेश जाएगा कि सरकारी सिस्टम आम आदमी की जिंदगी से खिलवाड़ करने की पूरी आजादी रखता है। बस्ती प्रशासन के लिए यह मामला केवल एक आवेदन नहीं, बल्कि उनकी कार्यक्षमता और संवेदनशीलता की असली अग्निपरीक्षा है। सवाल यह है कि क्या सुमन को उसका ‘जीवन’ वापस मिलेगा, या वह फिर से फाइलों के जंगल में कहीं खो जाएगी? प्रशासन को इस लापरवाही का जवाब देना होगा।



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