बस्ती के जिला पंचायत अध्यक्ष संजय चौधरी पर दोमुंही राजनीति और गंभीर विरोधाभास का आरोप लगा है। उन पर दावा किया गया है कि उन्होंने एथेनॉल बनाने वाली एक कंपनी से मानचित्र स्वीकृति के लिए 14 लाख रुपये का विकास शुल्क लिया था, लेकिन अब वे उसी फैक्ट्री के निर्माण का विरोध कर रहे हैं। इस कदम को उनकी कथनी और करनी में स्पष्ट विरोधाभास तथा अवसरवाद की पराकाष्ठा बताया जा रहा है, जिस पर जनता सवाल उठा रही है कि यह विरोध है या वसूली का दबाव।
लेख में कहा गया है कि फैक्ट्री का मानचित्र स्वयं अध्यक्ष की सहमति से स्वीकृत हुआ था और इसके लिए कंपनी ने 14 लाख रुपये का भुगतान किया, जिसकी रसीद भी दी गई थी। इस तथ्य की जानकारी होने के कारण संजय चौधरी के नेतृत्व में हो रहे इस विरोध को उतना समर्थन नहीं मिल रहा, जितना मिलना चाहिए, क्योंकि लोगों को इसकी मंशा पर संदेह है। सोशल मीडिया पर भी लोग उनकी इस कार्यप्रणाली पर टिप्पणी कर रहे हैं और पूछ रहे हैं कि यदि विरोध जायज था, तो मानचित्र स्वीकृति के समय चुप्पी क्यों साधी गई?
मामला केवल फैक्ट्री विरोध तक सीमित नहीं है, बल्कि संजय चौधरी पर ठेकेदारों के साथ धोखाधड़ी का आरोप भी है। एक भाजपा नेता ने दावा किया है कि उन्होंने अध्यक्ष के कार्यालय के नवीनीकरण के लिए लगभग नौ लाख रुपये का काम किया था, लेकिन भुगतान के समय टालमटोल की गई। नेताजी को महज कुछ हजार रुपये या टुकड़ों में लगभग ढाई लाख रुपये का भुगतान मिला, जबकि शेष साढ़े छह लाख रुपये आज तक बकाया हैं। आरोप है कि अध्यक्ष ने ठेकेदार का पंजीकरण न होने का बहाना बनाकर उन्हें किसी अन्य के फर्म पर काम करने को मजबूर किया और अब वे नेताजी का फोन भी नहीं उठा रहे हैं।
इन ‘कारनामों’ को लेकर संजय चौधरी सोशल मीडिया पर लगातार ट्रोल हो रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यदि 2027 के चुनावों में भाजपा ने उन्हें किनारे कर दिया, तो उनका विधायक बनने का सपना अधूरा रह सकता है।
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