बस्ती जनपद में केंद्र सरकार का महत्वाकांक्षी ‘जल जीवन मिशन’ भ्रष्टाचार और घटिया निर्माण की भेंट चढ़ता दिख रहा है। सदर ब्लॉक के सुकरौली गांव में करोड़ों रुपये की लागत से बन रही पानी की टंकी की चहारदीवारी एक मामूली आंधी भी नहीं झेल पाई और ढह गई। यह घटना परियोजना में व्याप्त गंभीर अनियमितताओं और गुणवत्ता से खिलवाड़ को उजागर करती है, जिससे ग्रामीणों में खासा आक्रोश है।
निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर शुरू से ही सवाल उठते रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि पानी की टंकी और उसकी चहारदीवारी के निर्माण में मानक सामग्री का इस्तेमाल नहीं किया गया है। ईंटों की जुड़ाई में सीमेंट की जगह बड़ी मात्रा में ‘सफेद बालू’ का उपयोग किया गया, जिससे निर्माण में बिल्कुल भी मजबूती नहीं आई। नतीजा यह है कि काम पूरा हुए अभी कुछ ही समय बीता है कि दीवारों और फर्श में दरारें आ चुकी हैं, और अब लीपापोती का दौर जारी है।
सदर ब्लॉक के सुकरौली में मेधा इंजीनियरिंग इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड, हैदराबाद को 150.54 लाख रुपये का ठेका दिया गया था, लेकिन टंकी अभी तैयार भी नहीं हुई कि उसकी चहारदीवारी गिर गई। ऐसी ही दुर्दशा हलूआधार ग्राम पंचायत में भी देखने को मिली, जहाँ 149.92 लाख रुपये की परियोजना का काम दो साल पहले पूरा हो जाना चाहिए था, लेकिन आज भी निर्माणाधीन पानी की टंकी जर्जर हालत में है और काम अधूरा पड़ा है। ग्रामीणों के अनुसार, गिरी हुई दीवारों के साथ-साथ पाइपों और टंकियों में लीकेज की समस्या भी आम हो गई है, जो निर्माण में हुई बड़ी धांधली की कहानी खुद बयां कर रही है।
इस पूरे मामले पर जब जल निगम (ग्रामीण) के अधिशासी अभियंता शफीकुर्रहमान से सवाल किया गया, तो उन्होंने कहा कि जहाँ भी खामियां सामने आ रही हैं, उन्हें ठीक कराया जा रहा है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अगले दस वर्षों तक इसकी देखरेख की जिम्मेदारी संबंधित कार्यकारी संस्था की ही होगी। हालांकि, सवाल यह बना हुआ है कि क्या सरकारी खजाने के करोड़ों रुपये की बर्बादी के बाद केवल मरम्मत से काम चल जाएगा, या फिर गुणवत्ता की अनदेखी करने वाली कंपनियों पर कोई कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। स्थिति यह है कि ‘जल जीवन मिशन’ के तहत बन रहे निर्माण सिर्फ ‘रेत का महल’ बनकर रह गए हैं, जिसका करोड़ों का बजट बदहाली की भेंट चढ़ रहा है।
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