बस्ती के जे.जे. हॉस्पिटल पर जिला उपभोक्ता आयोग ने किडनी की पथरी के ऑपरेशन में ‘घोर लापरवाही’ बरतने के लिए भारी जुर्माना लगाया है। आयोग ने अस्पताल प्रबंधन को मरीज को हुए इलाज के खर्च पर 10% ब्याज सहित सात लाख रुपये और अतिरिक्त क्षतिपूर्ति के तौर पर एक लाख दस हजार रुपये, यानी कुल आठ लाख दस हजार रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया है।
खलीलाबाद के कोड़रा गांव निवासी सोनू कुमार अक्टूबर 2021 में पथरी के इलाज के लिए जे.जे. हॉस्पिटल पहुंचे थे, जहाँ उन्हें दूरबीन विधि (लैप्रोस्कोपी) से ऑपरेशन का भरोसा दिया गया। अस्पताल ने ऑपरेशन के नाम पर भारी रकम वसूली, लेकिन ऑपरेशन के बाद मरीज की स्थिति और भी गंभीर हो गई। जब मरीज दोबारा अस्पताल पहुंचा, तो सुधार के बजाय उससे तीन लाख रुपये और ऐंठ लिए गए। बाद में लखनऊ के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में हुई जांच में खुलासा हुआ कि जे.जे. हॉस्पिटल की लापरवाही के कारण पथरी पूरी तरह नहीं निकली थी, जिससे संक्रमण पूरे शरीर में फैल गया था।
पीड़ित सोनू कुमार ने अद्विक लीगल कंसल्टेंसी के माध्यम से जिला उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया। साक्ष्यों और तथ्यों का गहन अवलोकन करने के बाद, आयोग के अध्यक्ष सुरेंद्र कुमार सिंह और सदस्य संतोष ने अस्पताल को दोषी करार दिया। कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि अस्पताल प्रबंधन को यह पूरी धनराशि 60 दिनों के भीतर अनिवार्य रूप से भुगतान करनी होगी।
यह मामला निजी अस्पतालों के उस ‘मुनाफाखोर’ चेहरे को बेनकाब करता है, जहाँ मरीजों की जान से ज्यादा उनके बिल की चिंता की जाती है। पीड़ित सोनू कुमार को अपना इलाज कराने के लिए कर्ज लेना पड़ा था, जबकि अस्पताल प्रबंधन अपनी गलती मानने को तैयार नहीं था। आयोग का यह फैसला स्वास्थ्य सेवा के नाम पर ‘लूट और लापरवाही’ का अड्डा बने अस्पतालों के लिए एक कड़ा सबक है, और यह सवाल उठाता है कि क्या केवल आर्थिक जुर्माने से उनका रवैया बदलेगा और स्वास्थ्य विभाग ऐसे अस्पतालों के संचालन पर निगरानी क्यों नहीं रखता।
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