बस्ती जिले के हर्रैया स्थित ‘आसरा आवास’ से एक ऐसी हृदयविदारक तस्वीर सामने आई है, जो सरकारी संवेदनहीनता की पराकाष्ठा को उजागर करती है। यहाँ दो बेसहारा बुजुर्ग 25 दिनों तक दर्द से कराहते रहे, लेकिन ‘बहरी हो चुकी सरकारी मशीनरी’ और प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह से मौन बनी रही। पत्रकार अजीत मिश्रा (खोजी) ने इस घटना को व्यवस्था पर एक ‘तमाचा’ बताया है, जो सवाल उठाती है कि इमारतों के बन जाने के बाद भी इंसानियत कहाँ है।
इस 25 दिनों की लंबी अवधि में, जहाँ बुजुर्ग अपने कमरे में दर्द से जूझ रहे थे और उनका शरीर जवाब दे रहा था, वहीं ‘जिम्मेदारों’ की आँखें नहीं खुलीं। पत्रकार के अनुसार, शायद उनके लिए फाइलों में सब कुछ ‘ठीक’ और ‘रिकॉर्ड दुरुस्त’ था, जिससे हकीकत की धूल में हाथ गंदा करने की जरूरत महसूस नहीं हुई। विडंबना यह है कि जिस ‘आसरा आवास’ का निर्माण बेसहारा लोगों को संबल देने के लिए हुआ था, वहीं के निवासी सबसे अधिक बेसहारा हो गए, जिससे सवाल उठता है कि क्या ये इमारतें सिर्फ ईंट-पत्थर का ढांचा हैं, जिनमें मानवता के प्राण नहीं फूँके जा सकते।
यह गनीमत रही कि ‘सेवा समर्पण भाव’ से जुड़े कुछ लोगों ने समय रहते पहल की, अधिकारियों को जगाया और स्वास्थ्य विभाग को मौके पर बुलाया। यदि उनका हस्तक्षेप न होता, तो शायद आज किसी इलाज की खबर की जगह ‘अंतिम संस्कार की हृदयविदारक रिपोर्ट’ सामने आती। फिलहाल, दोनों बुजुर्गों को जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहाँ वे जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं, और उनके स्वस्थ होने की प्रार्थना की जा रही है।
यह घटना केवल संबंधित अधिकारियों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक ‘गहरा घाव’ छोड़ गई है। पत्रकार सवाल उठाते हैं कि जब समाज के भीतर बुजुर्गों की कराह अनसुनी होने लगे, तो यह इस बात का संकेत है कि हमारी सामूहिक इंसानियत गंभीर रूप से बीमार हो चुकी है। अंत में यह प्रश्न पूछा गया है कि इमारतों के नीचे दबी इस बेरुखी का जिम्मेदार कौन है और क्या संवेदनहीनता अब हमारी सरकारी कार्यशैली का हिस्सा बन चुकी है। चेतावनी दी गई है कि अगर आज नहीं जागे, तो कल हमारे हिस्से में भी ऐसी ही ‘खामोश मौतें’ आएंगी, क्योंकि इमारतें बनाना आसान है, लेकिन उनमें इंसानियत को ज़िंदा रखना सबसे कठिन काम है, और इस परीक्षा में हम पूरी तरह विफल होते दिख रहे हैं।
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