बस्ती जनपद के रुधौली क्षेत्र में ‘माँ के नाम एक पेड़’ अभियान और पौधारोपण के शोर के बीच पर्यावरण संरक्षण के नाम पर चल रहे ढोंग का एक स्याह सच सामने आया है। एक तरफ जहाँ चारों ओर पौधारोपण की फोटो खिंचवाने और भाषणों का दौर चल रहा है, वहीं दूसरी तरफ रुधौली क्षेत्र की आरा मशीनों पर सदियों पुराने आम और महुआ के वृक्षों की बेरहमी से बलि दी जा रही है। स्थानीय लोगों द्वारा सवाल उठाए जाने पर आरा मशीन संचालक कागजी वैधता का हवाला देकर सब कुछ वैध होने का दावा करते हैं।
इस खेल में वन विभाग की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। स्थानीय चर्चाओं के अनुसार, पेड़ काटने की अनुमति अक्सर अर्जुन या यूकेलिप्टस जैसे पेड़ों के नाम पर ली जाती है, लेकिन असल में कुल्हाड़ी आम और महुआ के पेड़ों पर चलाई जाती है। सबूत मिटाने के उद्देश्य से कटान के बाद वृक्षों के ठूँठ और जड़ों को भी उखाड़ दिया जाता है ताकि कोई निशान न बचे। इसके बावजूद, स्थानीय प्रशासन इस पूरे मामले पर मूकदर्शक बना हुआ है और वृक्ष कटान का विवरण सार्वजनिक नहीं किया जा रहा है।
इस पूरे मामले का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि रुधौली में इस वृक्ष कटान के खिलाफ आवाज उठाने वाले पत्रकार पर ही मुकदमा दर्ज कर दिया गया है। पत्रकार पर हुए इस मुकदमे को लोकतंत्र में ‘प्रश्नों की छँटाई’ के रूप में देखा जा रहा है। अजीत मिश्रा (खोजी) के अनुसार, ‘एक पेड़ माँ के नाम’ का नारा तभी सार्थक हो सकता है जब हम नए पौधे लगाने के साथ-साथ शीतल छाया देने वाले पुराने जीवित वृक्षों को भी बचाएँ।
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